नहि परागु नहि मधुर मधु, नहि विकास इहि काले।
अली कली ही सौं बँध्यो, आगैं कौन हवाल ॥
राजा के हृदय पर इस दोहे ने जादू का-सा असर किया। वे पुनः राजकाज में रुचि लेने लगे। बिहारी बड़े गुणज्ञ थे। उन्हें अनेक विषयों की जानकारी थी। सुह बात उनकी सतसई का अध्ययन करने पर स्पष्ट रूप से ज्ञात हो जाती है। अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद बिहारी को वैराग्य हो गया और वे दरबार छोड़कर वृन्दावन चले गये। वहाँ पर संवत् 1720 (सन् 1663 ई०) के आस-पास इनकी मृत्यु हो गयी।
साहित्यिक सेवाएँ- बिहारी को निश्चय ही रीतिकाल का प्रतिनिधि कवि कहा जा सकता है; क्योंकि उनमें रीतिकालीन काव्य की सभी प्रमुख प्रवृत्तियाँ मिलती हैं। रीतिकाल में एक धारा रीतिबद्ध कवियों की थी तथा दूसरी धारा रीतिमुक्त कवियों की। बिहारी ने रीतिकाल की बँधी-बँधाई परिपाटी के अन्तर्गत भी अपने लिये एक मध्यम मार्ग का निर्माण किया। यही बिहारी की वह विशेषता है, जिसने उन्हें रीतिसिद्ध काव्यधारा का एकमात्र कवि बना दिया। उन्होंने ही इस धारा का प्रवर्तन किया और उन्हीं के साथ यह समाप्त भी हो गयी। यह बिहारी की असाधारण प्रतिभा का एक ज्वलन्त प्रमाण है।
ग्रन्थ - बिहारी ने कुल 719 दोहे लिखे हैं, जिन्हें 'बिहारी-सतसई के नाम से संग्रहीत किया गया है। इसकी अनेक टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं। 'बिहारी-सतसई' के समान लोकप्रियता रीतिकाल के किसी अन्य ग्रन्थ को प्राप्त न हो सकी।
साहित्य में स्थान- निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि बिहारी उच्चकोटि के कवि एवं कलाकार थे। असाधारण कल्पना-शक्ति, मानव-प्रकृति के सूक्ष्म ज्ञान तथा कला-निपुणता ने बिहारी के दोहों में अपरिमित रस भर दिया है। इन्हीं गुणों के कारण इन्हें रीतिकालीन कवियों को प्रतिनिधि कवि कहा जाता है।
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