‘दशहरा’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘दस सिरों का हारना’ क्योंकि श्रीराम ने रावण को जिसके दस सिर थे, हरा दिया था, इसलिए इसका नाम ‘दशहरा’ पड़ गया। इसके अतिरिक्त इस पर्व को ‘विजयदशमी’ भी कहा जाता है। यह त्योहार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है। दशहरा धर्म की अधर्म पर तथा न्याय की अन्याय पर विजय का प्रतीक है। इस समय वर्षा की ऋतु के बाद शरद् ऋतु की शुरुआत होती है। इस दिन श्रीराम ने लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध करके विजय प्राप्त की थी। रावण पर विजय प्राप्त करने की स्मृति में यह त्योहार मनाया जाता है।
बंगाल में यह त्योहार ‘दुर्गा पूजा’ के रूप में अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। पुराणों की कथा के अनुसार, महिषासुर नामक राक्षस के अत्याचारों से जब पृथ्वी त्राहि-त्राहि कर उठी, तो माँ दुर्गा ने उसके साथ नौ दिन तक घोर संग्राम किया। इसके बाद दसवें दिन उसे मार गिराया। इसलिए नौ दिन तक नवरात्र पूजा होती है और दसवें दिन दुर्गा की प्रतिमा को नदी या समुद्र में विसर्जित किया जाता है। दशहरे से पहले आठ दिन तक रामलीला होती है। रामलीला के दौरान कागज़ और बाँस आदि की सहायता से रामलीला मैदान में एक और लंकी बनाई जाती है। उसे बम, पटाखों और आतिशबाजी के अन्य वस्तुओं से सजाया जाता है। हनुमान जी के द्वारा उसमें आग लगा दी जाती है। दूसरी ओर से रावण और राक्षस आदि आते हैं। उनका युद्ध होता है। एक बड़े खुले मैदान में रावण, कुंभकरण और मेघनाद के बड़े-बड़े पुतले बनाकर खड़े किए जाते हैं। गोले और आतिशबाजियाँ चलती हैं। इसके बाद राम और लक्ष्मण के बाणों से रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जल उठते हैं। दशहरा मनाने से श्रीरामचंद्र, लक्ष्मण, हनुमान आदि की वीरता और विजय का संस्कार बच्चों के हृदय पर बहुत पड़ता है। वे राम-लक्ष्मण की तरह धनुष-बाण लेकर खेल खेला करते हैं।
विजयदशमी का त्योहार अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। यह त्योहार हमें यह प्रेरणा देता है कि धर्म की अधर्म पर सदा विजय होती है। श्रीराम ने रावण पर जो विजय प्राप्त की थी, वह धर्म की अधर्म पर, न्याय की अन्याय पर ही विजय थी। यह त्योहार हमें धर्म, मर्यादा तथा कर्तव्य-पालन की प्रेरणा देता है। श्रीराम के आदर्शों से जुड़ा यह त्योहार यह शिक्षा भी देता है कि हमें श्रीराम के समान बनने का प्रयास करना चाहिए और अन्याय के समझ कभी झुकना नहीं चाहिए। भारत की संस्कृति में त्योहारों का विशेष महत्त्व है। हमें चाहिए कि त्योहारों को हर्ष और उल्लाह से मनाएँ तथा उनसे प्रेरणा लें।