‘प्रदूषण’ शब्द में दो शब्द मिले हैं-प्र + दूषण अर्थात दूषयुक्त। प्रदूषण का साधारण अर्थ है पर्यावरण के संतुलन का दोषपूर्ण हो जाना। प्रदूषण के कारण ही जल, थल और वायु दूषित हो गई है।
वर्तमान युग को मशीनी युग कहा जाता है। जहाँ मशीन का सहारा लेकर मानव ने अपने जीवन को सुख सुविधाओं से युक्त बनाने के लिए अनेक आविष्कार कर डाले। वहीं दूसरी ओर अपने लिए नित नई समस्याओं को भी जन्म दे डाला। विज्ञान ने जहाँ हमारे जीवन में वरदान दिए, वहीं दूसरी ओर उसके वरदान अभिशाप भी बन गए। उन्हीं में से एक है-प्रदूषण। प्रदूषण की समस्या हमारे समक्ष सुरसा के समान मुँह बाए खड़ी है।
वनों की अंधाधुंध कटाई के कारण प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया है। महानगर वायु प्रदूषण के प्रकोप से सर्वाधिक ग्रस्त हैं। इसका मुख्य कारण है नगरों का तीव्र गति से विकास व औद्योगीकरण। सड़कों पर दौड़ते वाहनों से निकलने वाले धुएँ व औद्योगिक चिमनियों से निकलने वाली जहरीली गैसों ने नगर के निवासियों का साँस लेना दूभर कर दिया है। लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण वाहनों व कारखानों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, जिससे वायु प्रदूषण भी बढ़ रहा है।
छोटे क्षेत्रों व महानगरों में जल-प्रदूषण के भिन्न-भिन्न कारण हैं। नदियों में पशुओं को नहलाना, नदी के पानी में स्वयं स्नान करना व कपड़े आदि धोना गाँवों में जल प्रदूषण के मुख्य कारण हैं। महानगरों के कारखानों के पाइपों से निकलता गंदा, रसायनयुक्त जल आस-पास की नदियों में मिल जाता है तथा उसे और दूषित कर देता है। गंगा नदी का जल भी आज प्रदूषित हो चुका है। प्रदूषित जल को पीने से अनेक जानलेवा बीमारियाँ हो जाती हैं।
जल प्रदूषण के कारण पेट के रोग हो जाते हैं। कारखानों से निकलने वाला कचरा नदियों, नालों में बहा दिया जाता है, जो जल को इतना प्रदूषित कर देता है कि उसे पीने से व्यक्ति हैजा, अजीर्ण, आंत्र शोध जैसे अनेक रोगों का शिकार हो जाता है।
बड़े-बड़े महानगरों में आवास की भारी समस्या है। इसीलिए वहाँ झुग्गी-झोपड़ियाँ बन जाती हैं जिनमें मज़दूर आदि रहते हैं। इनके कारण गंदगी होती है तथा भूमि पर प्रदूषण होता है। मुंबई की चालें, दिल्ली की झुग्गी झोपड़ियाँ, कानपुर, चेन्नई तथा कोलकाता के स्लम इसके उदाहरण हैं। साथ ही अधिक अन्न उगाने के लिए जिस प्रकार कीटनाशकों तथा रासायनिकों का प्रयोग किया जा रहा है, उससे भी भूमि प्रदूषित होती है। भूमि पर प्रदूषण के कारण अनेक बीमारियों का जन्म होता है।
महानगरों में वाहनों, लाउडस्पीकरों, मशीनों तथा कल कारखानों के बढ़ते शोर के कारण ध्वनि प्रदूषण भी बढ़ गया है जिसके कारण रक्त-चाप, हृदय रोग, कान के रोग आदि जन्म लेते हैं।
आज प्रदूषण मानव स्वास्थ्य को धीरे-धीरे घुन की भाँति खाए जा रहा है। मलेरिया, हैजा, चिकनगुनिया कैंसर श्वास के रोग, उच्च रक्त चाप जैसी बीमारियाँ प्रदूषण के कारण बढ़ रही हैं। यद्यपि प्रदूषण एक विश्वव्यापी समस्या है तथापि इसका एकमात्र समाधान वृक्षारोपण है। वृक्ष वातावरण को शुद्ध वायु प्रदान करते हैं। औद्योगिक इकाइयों को यदि धनी आबादी वाले क्षेत्रों से हटकर नगरों से दूर स्थापित किया जाए, तो इससे प्रदूषण के विस्तार को रोका जा सकता है। वनों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगाई जानी चाहिए।