जन्म देने वाली माता तथा जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं। देशप्रेम एक पवित्र भावना है, जिसके द्वारा मनुष्य निष्ठा और समर्पण के साथ देश सेवा में संलग्न रहता है। सच्चा देशप्रेम आत्मबलिदान से परिपूर्ण होता है। जिस मातृभूमि के अन्न-जल को ग्रहण कर हमारा शरीर पुष्ट होता है, जिसकी गोदी में पवित्र वायु में साँस लेकर हम जीते हैं, उस प्यारी मातृभूमि पर हमें सदा सर्वस्व न्योछावर कर देने के लिए तैयार रहना चाहिए। जिस प्रकार मनुष्य प्रेम और त्याग के साथ अपने परिवार का पोषण करता है, उसी प्रकार प्रेम और त्याग के साथ उसे अपने देश की रक्षा करनी चाहिए।
देशप्रेम की इसी भावना से महाराणा प्रताप ने अकबर की विशाल सेना का सामना किया। छत्रपति शिवाजी महाराज ने औरंगजेब से लोहा लिया। अंग्रेजी शासन का विरोध करते हुए झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु तथा अन्य अनेक देशभक्त हँसते-हँसते शहीद हो गए। इन्होंने अपनी सुख-सुविधाओं और अपने जीवन की तनिक भी परवाह न करके सदा देश के हित में ही सोचा।
स्वदेश प्रेम एक ऐसी संजीवनी है, जो जाति, धर्म, संप्रदाय आदि के घेरों को तोड़कर देशप्रेमियों को एक कर देती है। यह एक पवित्र ज्योति है। जिस व्यक्ति के मन में देश प्रेम न हो, वह मनुष्य-मनुष्य न होकर पशु तुल्य होता है। आज देश में शुद्ध देशप्रेम तथा राष्ट्रभक्ति की अत्यंत आवश्यकता है। संकीर्ण स्वार्थ भाव को त्यागकर राष्ट्रहित के कार्य करने पर देश का गौरव हम बढ़ा सकेंगे।