Question
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत ।

Answer

मन बलवान है तो शरीर से कमजोर व्यक्ति भी बड़ेबड़े काम कर डालता है और मन कमजोर है तो हृष्ट-पुष्ट व्यक्ति भी कुछ नहीं कर पाता। मन की शक्ति ही साहस है। वही आत्मबल है। दृढ़ विश्वास भी उसी का नाम है। कई बार व्यक्ति अपने किसी काम में असफल हो जाता है। असफल होना उतना बुरा नहीं है, जितना उस असफलता से मन का हार जाना। मन नहीं हारा है तो दुबारा प्रयत्न करने पर वह उसमें सफल हो सकता है।

एक ही परीक्षा में कई बार असफल होकर अंत में सफल हुए व्यक्ति देखे गए हैं। इसका कारण यही है कि वे मन से निराश नहीं हुए, मन से नहीं हरि हैं। व्यक्ति का ऐसा मनोबल ही उसकी हार को भी जीत में बदल देता है। महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी जैसे पुरुष ऐसे ही योद्धा थे जो मन से कभी नहीं हारे थे। उनकी दृढ़ आत्मशक्ति ने ही उनकी पराजयों को भी विजय में बदल दिया था। इसीलिए कहा गया है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।

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