सम्प्रेषण की बाधाएँ
सम्प्रेषण की मुख्य-मुख्य बाधाओं को निम्न प्रकार से
वर्गीकृत कर स्पष्ट किया जा सकता है-
I. संकेतिक/संकेतीय बाधाएँ-
यह भाषा की वह शाखा है जो शब्दों तथा वाक्यों के अर्थ से सम्बन्ध रखती है। अत: इन्हें सम्प्रेषण की भाषा सम्बन्धी बाधाएँ भी कहा जा सकता है। ये बाधाएँ उन समस्याओं तथा बाधाओं से सम्बन्धित हैं जो सन्देश की एनकोडिंग तथा डिकोडिंग करने की प्रक्रिया में उन्हें शब्दों अथवा संकेतों में परिवर्तित करते समय आती हैं। ये बाधाएँ निम्नलिखित हैं-
1. सन्देश की अनुपयक्त अभिव्यक्ति-कई बार अधिकारी अधीनस्थों को निर्दिष्टं अर्थ नहीं समझा पाता है। यह सन्देश की अनुपयुक्त अभिव्यक्ति अपर्याप्त शब्द भण्डार के कारण, गलत शब्दों के प्रयोग करने से, आवश्यक शब्दों का प्रयोग नहीं करने के कारण इत्यादि से हो सकता है।
2. विभिन्न अर्थों सहित संकेतक-एक शब्द के बहुत से अर्थ हो सकते हैं। सन्देश प्राप्तकर्ता को शब्द के उसी अर्थ को समझना है जो सन्देश प्रेषक उसे समझाना चाहता है। यदि ऐसा नहीं होता है तो भी सम्प्रेषण में बाधा आती है।
3. त्रुटिपूर्ण रूपांतर/अनुवाद-कुछ स्थितियों में, सम्प्रेषण का मसौदा मूलरूप से किसी एक भाषा (अंग्रेजी) में तैयार किया जाता है और इसे कर्मचारियों को समझाने के लिए इसका हिन्दी में अनुवाद करना होता है। यदि अनुवादक दोनों ही भाषाओं का अच्छा जानकार नहीं है, तो सम्प्रेषण को अन्य अर्थ देने के कारण अनुवाद में गलतियाँ हो सकती हैं। इस प्रकार त्रुटिपूर्ण अनुवाद भी सम्प्रेषण में एक बाधा का कार्य करता है।
4. अस्पष्ट संकल्पनाएँ-कुछ सम्प्रेषणों की विभिन्न संकल्पनाएँ, भिन्न व्याख्याओं के कारण हो सकती हैं। दोनों पक्षकार जब सम्प्रेषण की अलग-अलग व्याख्या करने लगते हैं तब भी सम्प्रेषण में बाधा उत्पन्न हो जाती है।
5. तकनीकी विशिष्ट शब्दावली-कई बार विशेषज्ञ अपने सन्देश में ऐसे तकनीकी शब्दों का प्रयोग अधिक करते हैं जो सन्देश प्राप्तकर्ता समझ नहीं पाते हैं। क्योंकि वे सम्बन्धित क्षेत्र के विशेषज्ञ नहीं होते हैं। ऐसी स्थिति में सन्देशों को ठीक से नहीं समझ पाने के कारण भी सम्प्रेषण में बाधा आती है।
6. शारीरिक हाव-भाव की अभिव्यक्ति की डिकोडिंग-सामान्यतया सन्देश प्रेषक के शरीर के हाव भाव तथा संकेत सन्देश देने में अत्यधिक महत्त्व रखते हैं। ङ्केऐसी स्थिति में जो कुछ कहा जाता है तथा शरीर के हावभाव द्वारा जो व्यक्त होता है उसमें यदि तालमेल नहीं हो तो भी सम्प्रेषण का गलत अर्थ निकाला जा सकता है।
II. मनोवैज्ञानिक बाधाएँ-
भावनात्मक अथवा मनोवैज्ञानिक कारक सम्प्रेषकों की बाधाओं के कार्य करते हैं। उदाहरण के लिए चिंतित व्यक्ति तथा क्रोधी व्यक्ति उपयुक्त तरीके से सम्प्रेषण नहीं कर सकता है। सम्प्रेषक की कुछ मनोवैज्ञानिक बाधाएँ निम्नलिखित हैं-
1. असामयिक मूल्यांकन-कुछ स्थितियों में लोग सन्देश के अर्थ का मूल्यांकन पहले से ही कर लेते हैं, इसके पहले कि सन्देश प्रेषक अपने सन्देश को पूरा करे। इस प्रकार का समय से पहले किया गया मूल्यांकन पूर्वकल्पित धारणाओं और पक्षपात के कारण होता है और यह स्थिति सम्प्रेषण के विरुद्ध मानी जाती है।
2. सावधानी का अभाव या ध्यान न होनासन्देश प्राप्तकर्ता का दिमाग स्थिर नहीं होकर और कहीं हो या वह ध्यानमग्न हो तो वह सन्देश को ध्यानपूर्वक नहीं सुन पायेगा। यह स्थिति भी एक मुख्य मनोवैज्ञानिक बाधा के रूप में कार्य करती है।
3. सम्प्रेषण के प्रसारण में लोभ/क्षय तथा अपर्याप्त प्रतिधारण-प्रायः मौखिक सम्प्रेषण में जब सम्प्रेषण विभिन्न स्तरों से प्रसारित होता है, उत्तरोत्तर सन्देश का प्रसारण का परिणाम सन्देश का क्षय, अथवा अशुद्ध सूचना के रूप में प्रतिफलित होता है। अकुशल प्रतिधारण क्षमता एक अन्य सम्प्रेषण की बाधा है। जो व्यक्ति सूचना को अधिक समय तक प्रतिधारण नहीं कर सकते, वे या तो रुचि नहीं लेते या असावधान होते हैं।
4. अविश्वास-सन्देश प्रेषक तथा सन्देश प्राप्तकर्ता के मध्य अविश्वास की स्थिति भी सम्प्रेषण में एक बाधा का कार्य करती है।
III. सांगठनिक बाधाएँ-
वे कारक जो सांगठनिक संरचना, आधारिक सम्बन्धों, नियम तथा अधिनियम इत्यादि से सम्बन्धित हैं, कभीकभी प्रभावी सम्प्रेषण में बाधाओं के रूप में कार्य करते हैं। कुछ प्रमुख सांगठनिक बाधाएँ निम्नलिखित हैं-
1. सांगठनिक नीति-यदि सांगठनिक नीति पूर्णतया स्पष्ट नहीं हो, सम्प्रेषण के स्वतन्त्र प्रवाह में सहायक नहीं हो तो यह स्थिति सम्प्रेषण की प्रभावशीलता में बाधा पहुँचाती है।
2. नियम तथा अधिनियम-संस्था के कठोर नियम तथा बोझिल प्रतिक्रियाएँ सम्प्रेषण में बाधक हो सकती हैं। उसी प्रकार से निर्दिष्ट माध्यमों से सम्प्रेषण विलम्ब के रूप में परिलक्षित हो सकता है।
3. पदवी/पद-सन्देश प्रेषक तथा सन्देश प्राप्त करने वाले के बीच पद की दूरी मनोवैज्ञानिक बाधा उत्पन्न कर सकती है। अपनी पदवी से प्रभावित अधिकारी अर्थात् प्रेषक अपने अधीनस्थों को अपनी भावनाओं की स्वतन्त्र अभिव्यक्ति की अनुमति प्रदान नहीं करता।
4. संगठन-संरचना की जटिलता-किसी भी संगठन में जहाँ प्रबन्ध स्तरों की संख्या अधिक है, सम्प्रेषण में विलम्ब होता है तथा उसमें विकृति भी आने लगती है। क्योंकि सूचनाएँ विभिन्न स्तरों से जितनी बार होकर गुजरती हैं उतना ही उनका क्षय होता है या अर्थ बदल जाता है।
5. सांगठनिक सुविधाएँ-यदि सम्प्रेषण के लिए निर्बाध, स्पष्ट तथा समय पर सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हों तो सम्प्रेषण में बाधा आती है। निरन्तर सभाएँ होना, सुझाव पेटी, शिकायत पेटी, सामाजिक तथा सांस्कृतिक जनसमूह, कार्य संचालन में पारदर्शिता इत्यादि सम्प्रेषण के स्वतन्त्र प्रवाह को प्रोत्साहित करती हैं। इन सुविधाओं का अभाव सम्प्रेषण सम्बन्धित समस्याएँ उत्पन्न करता है।
IV. व्यक्तिगत बाधाएँ-
सन्देश प्रेषक तथा सन्देश प्राप्तकर्ता दोनों के व्यक्तिगत कारक भी सम्प्रेषण के मार्ग में बाधा उत्पन्न करते हैं। कुछ प्रमुख व्यक्तिगत बाधाएँ निम्नलिखित हैं-
1. सत्ता के सामने चुनौती का भय-यदि कोई अधिकारी यह अनुमान लगाता है कि कोई विशेष सूचना/सम्प्रेषण उसकी सत्ता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता है तो वह उस सम्प्रेषण को रोक सकता है या प्रतिबन्ध लगा देता है।
2. अधिकारी का अपने अधीनस्थों में विश्वास का अभाव-यदि अधिकारी अपने अधीनस्थों की कुशलता, योग्यता एवं दक्षता में विश्वास नहीं करता या वह उनसे आश्वस्त नहीं होता तो वह उनके विचार तथा सुझावों को कोई महत्त्व नहीं देता है।
3. सम्प्रेषण में अनिच्छा-कभी-कभी कर्मचारी/ अधीनस्थ अपने अधिकारियों से सम्प्रेषण के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं होते, यदि उन्हें लगता है कि यह उनके हितों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर रहा है।
4. उपयुक्त प्रोत्साहनों का अभाव-यदि सम्प्रेषण के लिए कोई अभिप्रेरणा अथवा प्रोत्साहन नहीं हो, कर्मचारी सम्प्रेषण के लिए पहल नहीं करेंगे। उदाहरण के लिए यदि अच्छे सुझाव के लिए कोई प्रशंसा/सराहना अथवा प्रतिफल नहीं हो तो कर्मचारी कोई उपयोगी सुझाव देने के लिए इच्छुक नहीं रहेंगे।