अनुशासन का अर्थ और महत्त्व-‘अनुशासन’ शब्द का अर्थ हैं-‘शासन अर्थात् व्यवस्था के अनुसार जीवन-यापन करना।’ यदि कोई व्यवस्था निश्चित है तो उसके अनुसार जीना। यदि व्यवस्था निश्चित नहीं है तो जीवन में कोई नियम-व्यवस्था या क्रम बनाना। अनुशासन जीवन को चुस्त-दुरुस्त बना देता है। इससे कार्यकुशलता बढ़ती है। समय का पूरा-पूरा सदुपयोग होता है।
अनुशासन की प्रथम पाठशाला परिवार अनुशासन का पाठ पहले-पहल परिवार से सीखा जाता है। यदि परिवार में सब कार्य व्यवस्था से किए जाते हैं तो बच्चा भी अनुशासन सीख जाता है। इसलिए मनुष्य को सबसे पहले अपना घर अनुशासित करना चाहिए।
व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के लिए अनशासन आवश्यक अनुशासन न केवल व्यक्तिगत जीवन के लिए आवश्यक है, अपितु सामाजिक जीवन के लिए भी परम आवश्यक है। व्यक्तिगत जीवन में अनुशासन का अर्थ है. छात्र को हर कार्य समय और व्यवस्था से करने की आदत होनी चाहिए। उसके काम करने के घंटे निश्चित होने चाहिए। दिनचर्या निश्चित होनी चाहिए।
सामाजिक जीवन में अनुशासन होना अनिवार्य है। जैसे – गाड़ियाँ, बसें, विद्यालय कार्यालय सभी समय से खुलें, समय से बंद हों। कर्मचारी ठीक समय पर अपने-अपने स्थान पर कार्य के लिए तैयार हों। वहाँ टालमटोल न हो। इसी के साथ छात्र भी सामाजिक कार्यों में यथासमय पहुंचे। वे वहाँ की सारी नियम-व्यवस्था का पालन करें।
अनशासन एक महत्त्वपूर्ण जीवन-मूल्य- पास
जीवन वास्तव में अनुशासन एक स्वभाव है। एक विद्या है। अनुशासन का लक्ष्य हैं-जीवन को समधुर और सुविधापूर्ण बनाना। अनुशासित व्यक्ति को सुशिक्षित और सभ्य कहा जाता है। वह न केवल स्वच्छता पर ध्यान देता है, बल्कि अपने बोलचाल और व्यवहार पर भी ध्यान देता है। वह समाज के बीच खलल नहीं डालता, बल्कि व्यवहार की गरिमा बढ़ाता है। इस प्रकार अनुशासन जीवन-मूल्य है, मनुष्य का आदर्श है।
यदि मैं अपने विद्यालयका प्रधानाचार्य होता
मेग लागशील मन अनेक बार स्वयं को भिन्न-भिन्न रूप में देखता है। कभी-कभी मैं कल्पना करता हूँ कि यदि मैं अपने विद्यालय का प्रधानाचार्य होता तो क्या होता? प्रधानाचार्य होने की कल्पना से ही मुझे लगता है कि मानो मेरे ऊपर बड़ी जिम्मेदारी आ गई है।
विद्यालय की यानिमितता प्रधानाचार्य बनते ही सर्वप्रथम मैं विद्यालय की सारी व्यवस्थाओं को नियमित करूंगा। विद्यालय नियमपूर्वक ठीक समय पर खुले, ठीक समय पर उपस्थिति, प्रार्थना आदि हो तथा निश्चित समयानुसार सभी. कालांश (पीरियड) लगें, इस काम
को मैं प्राथमिकता दूंगा।
परीक्षाओं की योजना – मेरी दृष्टि में परीक्षाओं की योजना पढ़ाई के लिए अत्यंत हितकर है। अत: मैं प्रयास करूंगा कि छात्रों की समय-समय पर छोटी-छोटी परीक्षाएं हों। वर्ष में दो बार बड़ी परीक्षाएँ हों ताकि छात्र छोटी परीक्षाओं के माध्यम से विषय को सारपूर्वक समझ लें और बड़ी परीक्षाओं के द्वारा पूरा पाठ्यक्रम तैयार कर लें। मैं नकल और धोखाधड़ी को पूर्णतया समाप्त कर दूंगा, चाहे इसके लिए किसी का दबाव क्यों न सहना पड़े।
गरीब तथा योग्य छानों की व्यवस्था में विद्यालय में उन गुदड़ी के तालों को पहचानने और विकसित करने का पूरा प्रयास करूंगा जो गरीबी के कारण अपनी प्रतिभा का विकास नहीं कर पाते। ऐसे छात्रों को प्रोत्साहन और सहायता दिलवाने का प्रयास करूंगा।
खेल-कट को प्रोत्साहन खेल-कूद को बढ़ावा देने के लिए मैं ऐसी व्यवस्था करूंगा कि प्रत्येक रूचिवाने छात्र को अपना प्रिय खेल खेलने का अवसर मिल सके। इसके लिए मैं कभी-कभी विद्यालय के छात्रों की विभिन्न खेल-प्रतियोगिताएं आयोजित करूँगा।
सांस्कृतिक कार्यकर मुझे भाषण, वाद-विवाद, कविता-पाठ, नाटक, अभिनय आदि सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गहरी रुचि है। मैं चाहूँगा कि मेरे विद्यालय के छात्र इन कार्यक्रमों में अधिकाधिक भाग लें। इसके लिए मैं कलासंपन्न अध्यापकों का एक उत्साही मंडल तैयार करूँगा जो बच्चों में ये कलाएं विकसित करें तथा उनका चहुंमुखी विकास करें।
अध्यापक-छात्र संबंध – मेरा प्रयास होगा कि मेरे विद्यालय के छात्र केवल ग्राहक न हों और अध्यापक ज्ञान-विक्रेता न हों। उनमें ज्ञान, श्रद्धा और प्रेम का गहरा संबंध होना चाहिए। इसके लिए मैं अनेक युक्तियों से प्रयास करूंगा। मैं अपने अध्यापकों और छात्रों के मध्य निर्भयता का वातावरण बनाऊँगा ताकि सब अपनी भावनाएँ एक-दूसरे को कह-सुन सकें। मैं समझता हूँ कि इन उपायों से मेरा विद्यालय एक श्रेष्ठ विद्यालय बन पाएगा।