बाढ़ के सम्बन्ध में पौराणिक आस्थाएँ थीं कि यह परमात्मा द्वारा भेजा हुआ अभिशाप है। जब धरती पर पापाचार बढ़ जाता है तो भगवान दैविक विपत्तियों को भेजते हैं. एक ओर तो विध्वंस के लिए और दूसरी ओर विलास और पापपूर्ण तन्द्रा में अलसाए हुए व्यक्तियों को सचेत करने के लिए।
वर्षा का पानी बड़े-बड़े पहाड़ों एवं समतल भूमियों पर गिरता है। नदी की सतह सबसे नीचे है, इसलिए वर्षा का सम्पूर्ण जल नदियों में तथा अन्य निम्न सतह वाली भूमि में चला जाता है। अतिवृष्टि होती है तो नदी-नाला एवं अन्य स्रोत वर्षा के सभी पानी को अपने तल में नहीं रख सकते। तब पानी उनके किनारों पर वह चलता है और मैदान, फसल और वास के स्थानों को डुबो देता है। यह बाढ़ कहलाता है। पहाड़ों पर बर्फ के पिघलने से बाढ़ आती है। बर्फ के पिघलने से नदी के पानी का आयतन बढ़ जाता है। बाँध के टूटने से भी बाढ़ आती है। अप्रत्याशित आकस्मिक ढंग से गरजता हुआ जल-प्रवाह कितना खतरनाक हो सकता है. इसकी कल्पना की जा सकती है।
बाढ़ आने से हमारे सामान बह जाते हैं। घर गिर पड़ते हैं। हमलोग गृह-विहीन हो जाते हैं। बहुत-से लोग और पशु नंदी की धारा में प्रवाहित हो जाते हैं। बाढ़ रेलवे लाइन को भी नष्ट कर देती है। व्यापक रोग फैल जाते हैं। अकाल पड़ जाता है। लोगों के साधन और औजार नष्ट हो जाते हैं। लोगों की जीविका नष्ट हो जाती है। बाढ़ रेलवे लाइन को भी नष्ट कर देती हैं। गाड़ियों का आना-जाना बन्द हो जाता है। कुछ दिनों तक पानी के जमे रह जाने से वहाँ सडाँध फैल जाती है और तरह-तरह की बीमारियाँ लोगों में घर दबाती हैं। खाने के लिए अन्न नहीं रहता, रहने के लिए मकान नहीं रहते, सारी आवश्यक सुविधाएँ बाढ़ के जल में बह जाती हैं। ऐसा भी देखा गया है कि लोग पेड़ों पर रहने लगते हैं और कभी-कभी वह पेड़ भी जल से कमजोर पड़कर सारे सामानों के साथ गिर पड़ता है। आँख के आगे चिल्लाते हुए बच्चे पानी के प्रवाह में बह जाते हैं और माँ-बाप विवश भाव से देखते रहते हैं। मानव-सभ्यता की हरी-भरी खेती को आक्रोश की एक ही हुँकार से त्रस्त कर देने वाला यह प्रकोप वास्तव में अनिष्टकारी है।
बिहार की कोसी, उड़ीसा की महानदी और बंगाल की दामोदर नदी में हमेश्च बाढ़ आती है। हजारों एकड़ जमीन की फसलों को नष्ट कर देती है। कोसी के अंचल में प्रायः प्रत्येक वर्ष बाढ़ आती है। इधर हाल में उत्तरी बिहार में जो भयानक बाढ़ आई थी वह भूली नहीं जा सकती। पानी का प्रबल वेग अप्रत्याशित रूप से रातों-रात घर में प्रविष्ट कर गया। लोग नीट की खुमारी में डूबे हुए थे। सहसा चारों ओर गाँव में हल्ला मच उठा और लोग बेतहाशा भाने लगे। जब तक पूरी तरह से चेते, तब तक बहुत कुछ समाप्त हो गया था। तुरंत यातायात के साधन भी नहीं। जुट सके और लोग चुपचाप प्रकृति के उन्मुक्त ताण्डव का नंगा रूप देखते रहे-उसके क्रूर हाथों द्वारा लूटते रहे, पिटते रहे। कोई किसी का न मित्र रहा, न कोई किसी का साथ देना वाला।
इस प्रकार हम देखते हैं कि बाढ़ भारतवर्ष के लिए एक गम्भीरतम समस्या है जिसका निराकरण देखने में असमभव जान पड़ता है। भारत की पंचवर्षीय योजनाओं में नदी घाटी योजनाओं की जो रूप-रेखा बनी है उसकी सर्वतोभावेन पूर्ति के बाद ही इस आकस्मिक विपत्ति का सामना हो सकेगा।