भमिका – जब विश्व-खेलों की परंपरा शुरू हुई, तब भारत गुलाम था। स्वतंत्रता के बाद भारत गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, जनसंख्या-विस्फोट जैसी समस्याओं से घिरा रहा। इसलिए खेलों की तरफ बहुत ध्यान नहीं दिया जा सका। न तो भारत ने आलपिक खेलों में अधिक भागीदारी की, न अधिक सफलता प्राप्त की।
ओलंपिक खेलों में भारत का इतिहास- भारत ने 1920 के ओलंपिक खेलों में पहली बार पाँव रखे थे। 1928 में हॉकी में पहला स्वर्णपदक जीता। तब से लेकर 1980 के ओलंपिक तक भारत ने आठ बार हॉकी में स्वर्णपदक पर कब्जा जमाया। हॉकी और भारत पर्याय हो गए। भारत. के कप्तान ध्यानसिंह को ‘हॉकी का जादूगर’ कहा जाने लगा। उसके बाद हॉकी प काले बादल छाने शुरू हुए। 2008 के बीजिंग ओलंपिक में हमारी यह स्वर्णिम टीम क्वालीफाई ही नहीं कर सकी।
व्यक्तिगत खेलों में पदक- व्यक्तिगत पदकों में भी भारत के पास कोई स्वर्णिम परंपरा नहीं है। सन् 1952 के हेलसिकी ओलंपिक में पहली बार के.डी. जाधव ने कुश्ती में कांस्य-पदक प्राप्त किया था। उसके 56 साल बाद इस बार दिल्ली के सुशील कुमार ने फिर से कांस्य-पदक प्राप्त किया है। टेनिस, भारोत्तोलन और मुक्केबाजी में भारत के नाम एक-एक पदक है। 1996 में भारत ने टेनिस में कांस्य पदक प्राप्त किया। 2000 के ओलंपिक में हरियाणा की मल्लेश्वरी देवी ने भारोत्तोलन में कांस्य-पदक जीता। 2008 के बीजिंग ओलंपिक में हरियाणा के मुक्केबाज बिजेंद्र सिंह ने पहली बार कांस्य-पदक प्राप्त किया है।
निशानेबाजी का खेल पिछले दो ओलंपिकों में भारत के लिए फलदायी रहा है। 2004 के . ओलंपिक में राजस्थान के राज्यवर्द्धन राठौर ने डबल ट्रैप निशानेबाजी में रजत पदक प्राप्त किया था। इस बार के ओलंपिक में चंडीगढ़ के अभिनव बिंद्रा ने 10 मीटर एयर रायफल स्पर्धा में स्वर्णपदक जीतकर भारत को नया विश्वास प्रदान किया है।
उपसंहार- इतने विशाल भारत की ये छोटी-सी उपलब्धियाँ संतोषजनक नहीं कही जा सकतीं। परंतु पहली बार भारत में व्यक्तिगत स्वर्णपदक आया है। पहली बार, एक नहीं तीन-तीन खेलों में पदक आए हैं। यह एक अच्छी शुरूआत कही जा सकती है। अब भारत की आशाएँ बढ़ गई हैं। अवश्य ही हमारे खिलाड़ी परिश्रम भी करेंगे।