पंरिचय- भारत की जिन नारियों ने अपने बलबूते पर देश का मस्तक ऊँचा किया, उनमें एक और नाम जुड़ गया है कल्पना चावला। प्यार से उसे पूरा देश ‘अंतरिक्ष-परी’ कहता है। हरियाणा के करनाल नगर में जन्मी कल्पना के पिता का नाम बनारसी लाल चावला है।
शिक्षा कल्पना ने मॉडल टाउन करनाल के टैगोर विद्यालय से आरंभिक शिक्षा प्राप्त की। वह आरंभ से ही कुशाग्र-बुद्धि, दृढ़ निश्चयी, प्रतिभाशालिनी तथा मौन थी। उसने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज, चंडीगढ़ से एरो स्पेस में बी.ई. की डिग्री प्राप्त की।
आकांक्षा और रुचि-कल्पना की बचपन से एक ही आकांक्षा थी—चाँद-सितारों को छूना। इसलिए उसने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज में एरोनाटिक्स में प्रवेश लेने की इच्छा व्यक्त की तो वहाँ के एक प्रोफेसर ने भी कहा कि यह क्षेत्र लड़कियों के लिए नहीं है। परंतु अपनी दृढ़ इच्छा-शक्ति का परिचय देते हुए उसने यही क्षेत्र चुना। बाद में उसने अमेरिका के टेक्सास विश्वविद्यालय से मास्टर डिग्री प्राप्त की। 1988 में उसकी नियुक्ति अमेरिका के सर्वोच्च अंतरिक्ष-अनुसंधान केंद्र नासा में हुई। सन् 1994 में उसे अंतरिक्ष यात्रा के लिए चुना गया। 19 नवंबर, 1997 को वह सौभाग्यशाली दिन आया, जब वह विश्व की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री के रूप में आकाश में उड़ी। कल्पना के आकाश में तो सभी उड़ते हैं किंतु कल्पना वास्तविक आकाश में उड़ी।
स्वभाव-कल्पना अत्यंत सौम्य स्वभाव की महिला थी। अखबार की सुर्खियों में आने के बाद भी उसमें अहंकार नहीं आया। उसकी सखियाँ, उसके अध्यापक, उसके पड़ोसी, माता-पिता, मित्र, प्रशंसक और अनुज सभी उसे अपना बहुत निकट मानते थे। कल्पना ने एक विदेशी युवक से विवाह किया। उसके पति भी उसकी सादगी और कर्मठता पर मुग्ध थे। उसके मधुर स्वभाव ने उसके पति को भी भारत का प्रेमी बना दिया।
विशेषज्ञ कल्पना कोलंबिया अंतरिक्ष अभियान के 28वें सफर में मिशन-विशेषज्ञ थी। उसे दूसरी बार अंतरिक्ष अभियान के लिए चुना गया। विशेषज्ञ दल ने कुशलतापूर्वक सभी कार्य संपन्न किए।
अंतिम यात्रा–1 फरवरी, 2003 को भारतीय समय के अनुसार 7.46 पर अंतरिक्ष यान को अमेरिका की धरती पर उतरना था। परंतु दुर्भाग्य सिर पर मँडरा रहा था। यान धरती के वायुमंडल में प्रवेश करना चाह रहा था कि अंतरिक्ष यान में विस्फोट हो गया। उसमें सवार सभी यात्री काल के गाल में समा गए। कल्पना भी उन्हीं के साथ इतिहास बन गई। जो लोग ढोल-नगाड़ों के साथ अपनी अंतरिक्ष-परी के अनुभव सुनने के लिए व्यग्र थे, वे ठगे-से रह गए। बस हमारे पास आँसू के सिवाय कुछ न था। परंतु ये आँसू गौरव के आँसू थे, श्रद्धा के आँसू थे। कल्पना चावला मर कर भी अमर हो गई। उसका नाम सबके लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।