भारत में सभी खनिजों का राष्ट्रीयकरण किया गया है, अर्थात इनका उत्पादन या तो सरकारी संस्थाओं द्वारा किया जा सकता है अथवा सरकार की अनुमति तथा निगरानी में निजी संस्थाओं द्वारा हो सकता है। दक्षिणी पठार के पूर्वी भाग में खनिजों का भण्डार अधिक है और इसी पठार की उत्तरी-पूर्वी सीमा पर मेघालय स्थित है। स्वर्भावतः उसके समीपवर्ती क्षेत्रों में कोयला, लौह अयस्क, चूना पत्थर, डालोमाइट जैसे खनिजों के विशाल भण्डार हैं। परन्तु इन खनिजों को कारखानों तक पहुंचाने के लिए न तो स्थलीय परिवहन सुविधाजक है, न समुद्री परिवहन, वायु परिवहन बहुत खर्चीला है। रेल लाइन बांग्लादेश का चक्कर लगाने के बाद ही कोलकाता तक आ सकती है। अतः इस क्षेत्र के जनजातियों वाले क्षेत्रों में खनिजों का स्वामित्व व्यक्तियों, समूहों या अब ग्राम पंचायतों के पास है। शिलांग से लगभग 40 किमी. दूरी पर जोबाई और चेरापूंजी स्थित है। यहाँ जनजातियों के परिवार कोयले का खनन विभिन्न प्रकार से करते हैं। एक बड़ी झोपड़ी के नीचे पहले कुएँ जैसा गहरा गड्ढा खोदा जाता है। फिर कोयला प्राप्त होने पर धीरे-धीरे क्षैतिज सुरंगें खोदी जाती हैं। ये पतली सुरंगें कभी-कभी बहुत दूर तक चली जाती हैं। चूहे जमीन के भीतर इस प्रकार की बिल खोदते हैं। इसलिए इसे रैट होल खनन कहते हैं।