शहरों का निरंतर विस्तार-आजकल धीरे-धीरे गांवों के लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। जिसे भी अवसर मिलता है, शहरों में बस जाता है। इस कारण पिछले वर्षों में कई कस्बे नगर बन गए हैं और नगर महानगर। महानगर भी समुद्र की भाँति फैलते चले जा रहे हैं। इस बढ़ते घनत्व के कारण महानगरों में हर प्रकार का प्रदूषण बढ़ रहा है।
बढ़ती जनसंख्या–भारत की बढ़ती जनसंख्या भी प्रदूषण के लिए खाज का काम कर रही है। आजादी के समय भारत की जनसंख्या 33 करोड़ थी। 50 वर्षों में यह तिगुनी हो गई। वही धरती, वही आकाश, वही नदियाँ, वही पहाड़ लेकिन जनसंख्या तिगुनी। साधन. वही, उपभोक्ता तीन गुने। इसका सीधा प्रभाव बढ़ते प्रदूषण पर पड़ा।
शहरों में बढ़ते विविध प्रकार के प्रदूषण-शहरों में अनेक प्रकार से प्रदूषण जा रहा है। सबसे प्रत्यक्ष है…-वायु-प्रदूषण। महानगरों के लोग स्वस्थ वायु में साँस नहीं ले पाते। सड़कों पर चलते हुए वाहनों का काला धुआँ पीना पड़ता है। अत्यधिक जनसंख्या के कारण जगह-जगह गंदगी के ढेर लगे रहते हैं। फैक्टरियों का धुआँ वातावरण को विषैला बना देता है। परिणामस्वरूप आदमी निर्मल वायु के लिए भी तरस जाता है।
जल-प्रदूषण महानगरों की बड़ी समस्या बन चुकी है। दिल्ली में बहने वाली यमुना में इतने नाले मिलते हैं कि यमुना के जल का रंग काला हो गया है। फैक्टरियों के दूषित जल के कारण
भूमि का जल भी लाल-काला हो गया है।
ध्वनि-प्रदूषण की स्थिति यह है कि महानगरों के लोगों में बहरापन और तनाव आम बीमारियाँ हो गई हैं। शांति का स्थान शोर ने ले लिया है। इसके लिए वैज्ञानिक साधनों के साथ-साथ आम लोग भी बराबर के दोषी हैं।
प्रदषण की रोकथाम के उपाय प्रदूषण की रोकथाम का पहला उपाय है सचेत होना। दूसरा उपाय है—प्रदूषण के कारणों और उससे बचने के तरीकों को जानना। जो उपाय आम जनता के हाथों में हैं, उनका व्यापक प्रचार-प्रसार करना ताकि लोग सजग हो सकें। जो उपाय सरकार के हाथों में हैं, उन पर सख्त कानून बनाए जाने चाहिए तथा उनका कठोरता से पालन करना चाहिए। सरकार तथा जनता के सम्मिलित सहयोग से ही प्रदूषण-मुक्त वातावरण तैयार हो सकता है।