पिताजी ने मेरा पाटी-बस्ता तैयार किया। फिर दादीजी व माताजी ने मुझे प्यार से पुचकार कर पिताजी के साथ विद्यालय में प्रवेश दिलाने के लिये भेज दिया। प्रधानाध्यापक के निर्देश पर पिताजी मुझे प्रारम्भिक कक्षा में ले गये और मुझे अध्यापक के सुपुर्द कर वापस आ गये।
कक्षा का पहला दिन-कक्षा में टाट-पट्टियाँ बिछी थीं। अध्यापकजी ने मुझे प्यार से एक स्थान पर बैठने के लिये कहा । वहाँ कक्षा में मेरी उम्र के पन्द्रह-बीस बच्चे बैठे हुए थे। गुरुजी ने प्यार से मेरा नाम पूछा। इसके बाद हम सभी अबोध शिष्यों को एक कहानी सुनाई तथा प्रारम्भिक दो अक्षरों 'अ, आ' का ज्ञान कराया।
पहले ही दिन अक्षरज्ञान तो अच्छी तरह नहीं हुआ, परन्तु सुनाई गई कहानी अच्छी लगी। दूसरी घण्टी में दूसरे अध्यापकजी आये। उन्होंने हमें पहले तो सफाई से रहने का उपदेश दिया, फिर गणित के दो अंक लिखने सिखाये। अन्त में छुट्टी हुई। पिताजी मुझे लेने आ गये थे। मैं उनके साथ प्रसन्नतापूर्वक घर आ गया।
उपसंहार-इस तरह विद्यालय का पहला दिन मेरे लिये संकोच और उल्लास का रहा। आज भी विद्यालय के प्रथम दिवस की याद आने पर मैं मन ही मन प्रसन्न हो जाता हूँ।
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