पुरुष-प्रधान समाज में नारी का संघर्ष-जिस समाज में हम जी रहे हैं, वह पुरुष-प्रधान है। यहाँ नारी कहने को देवी अवश्य है किंतु व्यवहार में उसका स्थान पुरुषों से कम है। इसलिए उसकी उन्नति में पग-पग पर बाधाएँ हैं। पुरुष-समाज नारी को आगे नहीं बढ़ने देना चाहता। वह नारी पर अपना दबदबा कायम रखना चाहता है। इसलिए पुरुष या तो नारी के जन्म को रोकता है। अगर वह पैदा हो जाए तो उसे शिक्षा से वंचित रखना चाहता है। वह शिक्षा पा लें तो उसे नौकरी में नहीं आने देना चाहता। वह नौकरी में आ जाए तो उससे घर के सारे काम करवाना चाहता है, ताकि वह दोहरे बोझ के नीचे पिसते-पिसते स्वयं ही हाथ खड़े कर दे। सचमुच पुरुष-प्रधान समाज में नारी का संघर्ष बहुत भीषण है।
घर-परिवार की सीमाओं से बाहर नई चुनौतियों-नारी जब से घर-परिवार की सीमाओं को लाँघकर बाहर निकली है, उसके सामने चुनौतियाँ भी बढो हैं। उसे पुरुषों के समाज में पग-पग पर पुरुषों से ही खतरे झेलने पड़ते हैं। पुरुष हमेशा नारी को अकेल देखकर उस पर अपना नियंत्रण करना चाहता है। बॉस के रूप में, सहकर्मी के रूप में, मातहत के रूप में, राह चलते यात्री के .रूप में, आवारगर्द बदमाश के रूप में हर रूप में वह सरी को परेशान करता है। नारी को नुकीले दाँतों के बीच रहने वाली कोमल जीभ की तरह रहना पड़ता है। फिर भी पुरुषों से मुकाबला करना पड़ता है और विजय भी प्राप्त करनी होती है।
विविध क्षेत्रों में नारी का योगदान भारत की वर्तमान नारी विकास के ऊँचे शिखर छू चुकी है। उसने शिक्षा के क्षेत्र में पुरुषों से बाजी मार ली है। कंप्यूटर के क्षेत्र में उसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण है। नारी-सुलभ क्षेत्रों में उसका कोई मुकाबला नहीं है। चिकित्सा, शिक्षा और सेवा के क्षेत्र में उसका योगदान अभूतपूर्व है। आज अनेक नारियाँ इंजीनियरिंग, वाणिज्य और तकनीकी जैसे क्षेत्रों में भी सफलता प्राप्त कर रही हैं। पुलिस, विमान-चालन जेसे पुरुषोचित क्षेत्र भी अब उससे अछूते नहीं रहे हैं।
नारी और नौकरी : दोहरी भूमिका कितनी संभव है, कितनी जरूरी- वास्तव में आज नारी की भूमिका दोहरी हो गई है। उसे घर और बाहर दो-दो मोर्चों पर काम सँभालना पड़ रहा है। घर की सारी जिम्मेदारियाँ और ऑफिस का कार्य-इन दोनों में वह जबरदस्त संतुलन बनाए हुए है। उसे पग-पग पर पुरुष-समाज की ईर्ष्या, घृणा, हिंसा और वासना से भी लड़ना पड़ता है। सचमुच उसकी अदम्य शक्ति ने उसे इतना महान बना दिया है।