भारत के उत्तर में भारत माता के मस्तक पर मुकुट की भाँति ‘सुशोभित’ हिमालय भारत के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यह भारत की गौरव तथा रक्षक है। भारत की सीमाओं का यह प्रहरी अनेक युगों से भारत की रक्षा करता आया है। भारत के उत्तर में एक तपस्वी की भाँति अचल, दृढ़ और मौन होकर खड़ा हिमालय हमें धैर्य, सहनशीलता और दृढ़ता का पाठ पढ़ाता है। यदि हिमालय न होता तो भारत की शस्य, श्यामला धरती मरुभूमि होती तथा धरती धन्य धान्य से पूर्ण न होती। इससे निकलने वाली अनेक पवित्र नदियाँ भारतवासियों के लिए गौरव की वस्तु हैं। हिमालय के कारण ही आज हम अनेक प्रकार से सुरक्षित तथा ऐश्वर्यशाली हैं। दिनकर जी ने ठीक ही कहा है-‘मेरे नगपति मेरे विशाल’।