किसी कवि ने ठीक ही कहा है- ‘यही पशु है कि आप-आप ही चरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे। परहित या परोपकार ही मानव-जीवन का धर्म है। परोपकार की भावना के बिना मनुष्य और पशु में कोई अंतर नहीं रह जाता। इस संसार के सभी तत्व मनुष्य के उपकार में लगे हुए हैं। नदी अपना जल स्वयं नहीं पीती। वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते; वर्षा अपने लिए नहीं बरसती; वायु अपने लिए नहीं चलती। अनेक महापुरुषों तथा साधु-संतों का जीवन भी इस बात का साक्षी है कि दूसरों के लिए जीवन ही वास्तविक जीवन है। स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, मदर टेरेसा, आदि के जीवन में यह भली-भाँति स्पष्ट हो जाता है कि मानव को सदैव परोपकार में लगा रहना चाहिए।