मेरा गाँव भारत के सात लाख गाँवों में से एक है। पाँच हजार की जनसंख्यावाले इस गाँव में बच्चों की संख्या अधिक है।
गाँव के बीचोबीच ऊँची-नीची और टेढ़ी-मेढ़ी कच्ची सड़क बनी हुई है। सड़क के दोनों किनारों पर कच्चे पक्के, छोटे-बड़े मकान हैं। हर मकान के इर्द-गिर्द एक-दो पेड़ हैं।
मेरा गाँव छोटे-बड़े कई मोहल्लों में बँटा हुआ है। हर मोहल्ले में एक कुआँ है। लगभग प्रत्येक कुएँ के पास तुलसी का बिरवा है। मेरे गाँव में अब जगह-जगह पानी के नल लग रहे हैं।
मेरे गाँव में सभी जातियों के लोग रहते हैं। प्रायः सभी खेती करते हैं। गाँव के लोग हिल-मिल कर रहते हैं। पंचायत के चुनाव के समय उनके बीच थोड़ा-बहुत दुराव आ जाता है, परंतु वह शीघ्र ही दूर हो जाता है। अब मेरे गाँव में शिक्षितों की संख्या बढ़ रही है। गाँव में एक हाईस्कूल और एक कन्या पाठशाला भी है।
गाँव में सप्ताह में दो दिन बाजार लगता है। इस बाजार में बहुत - से लोग आते हैं। इससे वहाँ काफी चहल - पहल रहती है।
मेरे गाँव के जो लोग देश के महानगरों और विदेशों में जाकर बसे हुए हैं, वे भी गाँव से किसी न किसी रूप में संबंध बनाए हुए हैं। गाँव में एक दवाखाना, एक सरकारी दुकान और छोटे-छोटे स्टोर भी खुल गए हैं। अब मेरा गाँव शहर बनने की तैयारी करता हुआ-सा दिखाई दे रहा है।