मेरी नीली जिल्द पर अंकित सुनहरे अक्षर देखकर मेरा जीवन- वृत्तांत सुनने के लिए आप बहुत उत्सुक हो रहे हैं।
तो सुनिए।
मुझे यह सुंदर शरीर और मनोहर रूप प्रदान करने का श्रेय मेरे प्रकाशक को है। एक अध्ययनशील व्यक्ति ने मुझे तैयार किया था। उन सज्जन को विद्यार्थी जीवन से ही विभिन्न विषयों की पुस्तकें पढ़ने का शौक था। वे प्रत्येक पुस्तक के प्रेरक एवं प्रभावोत्पादक वाक्य अथवा कविता की पंक्तियाँ एक कॉपी में लिख लेते थे। धीरे- धीरे उनके पास सुभाषितों का एक बड़ा संग्रह तैयार हो गया। उन्होंने इसी संग्रह में से छाँटकर मेरा निर्माण किया और नामकरण किया - 'सुभाषित रत्नावली'। इसके बाद उन्होंने मुझे एक प्रकाशक को सौंप दिया। प्रकाशक महोदय ने मुझे छापा, सजा-धजाकर मनोहर रूप प्रदान किया और कुछ ही समय के भीतर मेरी हजारों प्रतियाँ बेच डालीं। उन्हीं प्रतियों में से में एक हूँ।
आपके पिता जी ने मेरा मनोहर रूप देखकर मुझे खरीदा था। यों तो मैं सुभाषितों का संग्रह मात्र हूँ, किंतु ये सुभाषित कई महान हस्तियों के अमूल्य उद्गार हैं। मेरे कुछ पृष्ठ पलटते ही तुम्हें इस बात की प्रतीति हो जाएगी। जब लोग उद्विग्न या उदास होते हैं, तब मुझे उठाकर मेरे पन्ने पलटने लगते हैं और फिर कोई प्रेरणादायक सुभाषित पढ़कर शक्ति और उत्साह से भर उठते हैं।
एक दिन मैं बड़ी मुसीबत में फँस गई थी। आपके पिता जी की अनुपस्थिति में एक छोटे बच्चे ने मुझे आलमारी से निकाल लिया। उसी समय उसकी छोटी बहन भी वहाँ आ पहुँची। दोनों मिलकर तेजी से मेरे पन्ने पलटने लगे। मुझे डर लग रहा था कि आज मेरा अंग-भंग होकर ही रहेगा। इतने में सौभाग्य से उनकी माता जी वहाँ आ गई। मेरी दुर्दशा होते देखकर उन्होंने उन दोनों को डाँटा और मुझे उनके हाथों से लेकर फिर से आलमारी में रख दिया।
मैं अपने आप को भाग्यशाली मानती हूँ कि एक सहृदय स्वामी ने मुझे अपने संग्रहालय में आश्रय दिया है।