एक जंगल में एक चालाक लोमड़ी रहती थी। दो दिन से उसे खाने के लिए कुछ नहीं मिला था। वह खाने की खोज में निकली, परन्तु उसे खाने के लिए कुछ नहीं मिला। वह मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करने लगी कि हे प्रभु! मेरी रक्षा कर। कुछ दूरी पर उसे एक बाग दिखाई दिया। वहाँ पर काले अंगूरों के बड़े-बड़े गुच्छे लटक रहे थे।
उन्हें देखकर लोमड़ी के मुँह में पानी भर आया। वह गुच्छों तक पहुँचने के लिए उछल-कूद करती रही। किन्तु उसके मुँह में अंगूरों का एक भी गुच्छा न आया। जब वह उछल-कूद करके बहुत थक गई, तो उसने अंगूरों को पाने का विचार छोड़ दिया। उसने जाते-जाते अंगूरों की ओर देखा, बोली कि मैं इन खट्टे अंगूरों का क्या करूँगी? इनके खाने से तो मेरा गला खराब हो जायेगा। शिक्षा-प्रत्येक असफल व्यक्ति चीज में दोष दूँढता है।