एक वन में किसी बहेलिये ने एक स्थान पर अपना जाल फैलाया और उस पर चावलों के कण बिखेरकर स्वयं छिपकर बैठ गया। तब कबूतरों के राजा चित्रग्रीव के द्वारा मना करने पर भी सारे कबूतर चावल खाने के लिए उतर पड़े और बैठते ही जाल में फँस गये। तब चित्रग्रीव के |कहने पर वे सब कबूतर जाल को लेकर एकसाथ उड़ गये, बहेलिया कुछ दूर तक उनके पीछे दौड़ता रहा, परन्तु अन्त में निराश होकर लौट गया। वे सभी कबूतर गण्डकी नदी के तट पर रहने वाले हिरण्यक नामक मूषक के पास जाकर उतरे।
हिरण्यक चित्रग्रीव का परम मित्र था। उसने कबूतरों को उतरते देखता, तो अपने बिल से बाहर आया। उसने सभी कबूतरों के बन्धन एक-एक करके काट डाले और उनके प्राणों की रक्षा की। तत्पश्चात् उनका अतिथि सत्कार कर उन्हें विदा किया। इस प्रकार हिरण्यक मूषक ने सच्ची मित्रता का निर्वाह किया।