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Question 14 Marks
परागण किसे कहते है ? मक्का एवं वेलिसनेरिया में परागण की क्रिया का संक्षिप्त विवरण किजिए।
Answer
परागकणों (Pollen Grains) का परागकोश से मुक्त होकर विभित्र विधियों एवं माध्यमों के द्वारा उसी पुष्प या उसी जाति के अन्य पुष्प के जायांग की वर्तिकाग्र (Stigma) तक पहुँचना परागण (pollination) कहलाता है।
1. मक्का के पुष्प एकलिंगी होते हैं।
2. नर पुष्प छोटे एवं अनाकर्षक होते हैं व पादप के शीर्ष पर पाये जाते हैं।
3. मादा पुष्प क्रम पर्णों के कक्ष में लगे होते हैं।
4. नर पुष्प के पुंकेसर लम्बे व मुक्त दोली होते हैं जो हल्की सी हवा चलने पर भी मुक्त दोलन कर परागकणों का प्रकीर्णन करते हैं।
5. परागकण हल्के, शुष्क, छोटे व रोयेदार सतह वाले होते हैं।
6. परागकण अत्यधिक संख्या में होते हैं जिससे कि परागण की क्रिया की प्रायिकता (Probability) को बढ़ाया जा सके।
7. परिपक्व परागकोश के स्फुटन के फलस्वरूप परागकण हवा में मुक्त हो जाते है।
8. चूंकि मादा पुष्प क्रम पर्ण के कक्ष में स्थित होता है और मादा पुष्यों की असंख्य वर्तिकाएं पतले रेशों के रूप में बाहर निकली होती है, अतः वायु में उड़ते परागकण इन वर्तिकाओं पर गिर जाते हैं।
9. इन अनुकूलनों के कारण इनमें वायु के माध्यम से परागण की क्रिया सम्पन्न होती है।
(i) वैलिसनेरिया में जलपरागण - वैलिसनेरिया जल निमग्र एकलिंगी (Dioccous) व ताजे पानी में पाया जाने वाला पादप है। नर पौधा काफी संख्या में नर पुष्प उत्पन्न करता है, जो टूटकर बन्द अवस्था में ही पानी की सतह पर आ जाते हैं। ऊपर आकार नर पुष्प जल सतह पर खुल (Open) जाते हैं। मादा पौधा, मादा पुष्प बनाता है। मादा पुष्प लम्बे कुण्डलित वृन्त पर लगा होता हैं जिससे यह पानी की सतह तक आ जाता हैं। वर्तिकाग्र तीन भागों में बंटी होती हैं। तैरते हुए नर पुष्प, मादा पुष्य के पास आता है और मादा पुष्प के सम्पर्क में आने से नर पुष्पों के परागकोश फट जाते हैं। परागकण वर्तिकाग्र से चिपक जाते हैं। परागण के उपरान्त मादा पुनः बन्द हो जाता हैं। इसका वृन्त कुण्डलित होकर पुष्य को पानी के अन्दर खींच लेता हैं।
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Question 24 Marks
आवृत्तबीजी पादपों की प्रमुख घटना दोहरा निषेचन तथा त्रिसंलयन से आपका क्या अभिप्राय है? एक पुष्पी पादप में परागण में निषेचन तंक की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 34 Marks
गुरूबीजाणुधानी की संरचना का वर्णन कीजिए।
Answer
गुरूबीजाणुधानी (बीजाण्ड) की संरचना (Structure of Ovule)- पुष्पीय पादपों की बीजाण्ड एक सवृंत छोटी संरचना है जो निषेचन के पश्चात बीज में परिवर्तित हो जाती हैं।
(i) बीजाण्डवृंत (Funicle) - बीजाण्ड के बाह्य आवरण को अध्यावरण कहते है। जो बीजाण्ड एक वृंत (डंठल) जैसी सरंचना द्वारा अपरा से जुड़ा रहती है। बीजाण्डवृंत जिस स्थल पर बीजाण्ड से जुड़ा रहता है उसे नाभिका (Hilum) कहते हैं।
(ii) अध्यावरण (Integument) -बीजाण्ड के बाहू आवरण को अध्यावरण कहते हैं, जो बीजाण्ड का संरक्षी आवरण होता है। निषेचन के पश्चात अध्यावरण बीज चोल (Seed coat) का निर्माण करते हैं। आवृतबीजी पादपों में प्रायः दो अध्यावरण होते है, परन्तु लीची, अरण्डी में तीन अध्यावरण होते हैं। लीची में खाने योग्य भाग तीसरा अध्यावरण होता है जिसे एरिल (Aril) कहते हैं।
(iii) बीजाण्डद्वार (Micropyle) -बीजाण्ड के उपरी सिरे पर एक छिद्र जैसी संरचना पायी जाती है जिसे बीजाण्डद्वार कहते है। बीजाण्डद्वार को छोड़कर अध्यावरण बीजाण्ड को चारों ओर से घेरे रहता है। निषेचन के समय परागनलिका बीजाण्डद्वार से प्रवेश करती है। बीजाण्डद्वारी सिरे के ठीक विपरीत निभाग (Chalaza) होता है।
(iv) बीजाण्डकाय (Nucellus) - यह बीजाण्ड की मृदूतकी संरचना है जो अध्यावरणों के द्वारा धिरी रहती हैं। बीजाण्डकाय का उपयोग प्रायः पोषण के लिए किया जाता है। एकबीजपत्री पादपों में यह एक पतली परत के रूप में बीज में पाया जाता हैं जिसे पेरिस्पर्म (Perisperm) कहते है।
(v) भ्रूणकोष (Embryo sac) - यह बीजाण्ड की मुख्य संरचना है जो बीजाण्डकाय द्वारा धिरी रहती है।
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Question 44 Marks
दोहरा निषेचन को समझाइए ।
Answer
द्विनिषेचन/दोहरा निषेचन (Double fertilization)
युग्मकों के स्वतंत्र होने पर एक नर युग्मक अण्ड से संयोजित होकर द्विगुणित युग्मनज (Zygote) बनाता है जो भ्रूण (Embryo) का निर्माण करता है। यह प्रथम निषेचन है तथा इसे संलयन (syngamy) या सत्य निषेचन (true fertilization) कहते हैं। दूसरा नर युग्मक, द्वितीयक केन्द्रक (2n) से संलयित होकर त्रिगुणित प्राथमिक भ्रूणपोष (केन्द्रक) (primary endosperm nucleas) केन्द्रक बनाता है जिससे भ्रूणपोष बनता है, यह द्वितीय निषेचन है। इस द्वितीय निषेचन में तीन अगुणित केन्द्रकों का संलयन होता है, इस कारण इसे त्रिसंयोजन/त्रिसंलयन (triple fusion) कहते है तथा दो निषेचन (प्रथम व द्वितीय) की प्रक्रिया को द्विनिषेचन (double fertilization) कहते है। युग्मक संलयन (syngamy) की खोज स्ट्रासबर्गर (Strasburger, 1884) ने तथा द्वि-निषेचन की खोज एस.जी. नावश्चिन (S.G. Nauaschin 1898) ने लिलियम व फ्रिटिलेरिया (Lilium & Fritillaria) में की थी।
विभिन्न पौधों में परागण एवं निषेचन के बीच 2-25 घण्टे का अंतराल होता है। आमतौर पर त्रिक संलयन अण्डकोशिका एवं नर युग्मक के संयोजन से पहले होता हैं।
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Question 54 Marks
निषेचन-पश्च घटना क्या है? पादप भ्रूणपोष की संरचना का वर्णन कीजिए। एक द्विबीजपत्री भ्रूण की संरचना का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer
निषेचन-पश्च घटना - निषेचन के पश्चात पुष्प के बाह्मदल, दल, पुमंग व वर्तिका नष्ट होकर गिर जाते है। बीजाण्ड परिपक्व होकर बीज मे तथा अण्डाशय फल में विकसित होता है ये समस्त घटनाएँ निषेचन पश्च घटनाएँ कहलाती है।
भ्रूणपोष (Endosperm)
भ्रूणपोष एक पोषक ऊतक है जिसका निर्माण पुष्पीय पादपों में निषेचन के पश्चात होता है। भ्रूणपोष भ्रूण के विकास व बीज अंकुरण के समय उपयोग में आता है। विकास के आधार पर भ्रूणपोष तीन प्रकार का होता है।
(1) केन्द्रकीय भ्रूणपोष (Nuclear endosperm) : इसमें भ्रूणपोष केन्द्रक
का बार-बार विभाजन द्वारा अनेक केन्द्रक बन जाते हैं, किन्तु भित्ति का निर्माण नहीं होता। इस विभाजन को स्वतंत्र नाभिक विभाजन (free nuclear division) कहते हैं। ये केन्द्रक भ्रूणपोष की परिधि की ओर विन्यासित हो जाते हैं तथा केन्द्र में एक बड़ी रिद्धिका (vacuole) बन जाती है। कुछ समय के पश्चात भित्ति निर्माण से कोशिकीय बन जाती है। यही भोज्य पदार्थ ऊतक अर्थात् भ्रूणपोष होता है। नारियल में दूध की तरह जलयुक्त भ्रूणपोष होता है। यह सामान्य प्रकार का भ्रूणपोष है जो आवृतबीजी के पोलीपेटेली (polypetalae) वर्ग व एकबीजपत्री पादपों में पाया जाता है। जैसे- मक्का, चावल, गेहूँ।
(2) कोशिकीय भ्रूणपोष (Cellular endosperm) : इसमें भ्रूणपोष केन्द्रक के
प्रत्येक विभाजन के पश्चात कोशिका भित्ति का निर्माण होता है। अतः यह आरंभ से अन्त तक कोशिकीय रहता है। सामान्यतः इस प्रकार के भ्रूणपोष में चूषकांग विकसित हो जाते है। इस प्रकार के भ्रूणपोष प्राय आवृत्तबीजी के गेमोपेटेली (Gamopetalae) वर्ग के सदस्यों में पाया जाता है।
(3) हेलोबियल भ्रूणपोष (Helobial endosperm) : यह उपरोक्त दोनों प्रकार के भ्रूणपोपों के मध्य का भ्रूणपोष है। यह केवल एकबीजपत्री के हिलोबियेल गण में पाये जाने के कारण ही इसे हेलोबियल (Helobial) भ्रूणपोष कहते हैं। प्राथमिक भ्रूणपोष केन्द्रक के प्रथम विभाजन पश्चात एक अनुप्रस्थ भित्ति बनने से यह दो प्रकोष्ठ (बीजाण्डद्वारी प्रकोष्ठ व निभागी प्रकोष्ठ) में विभक्त हो जाता है। निभागी प्रकोष्ठ वाली छोटी कोशिका के केन्द्रक मे मुक्त विभाजन होते हैं। बीजाण्ड द्वारी प्रकोष्ठ में केन्द्रक विभाजन एवं भित्ति निर्माण साथ-साथ होता है। इस प्रकार यह भ्रूणपोष केन्द्रकीय एवं कोशिकीय दोनों प्रकार के भ्रूणपोष का मिला-जुला रूप होता है।
अनेक पौधों में बीज का निर्माण होते समय भ्रूण अपने विकास के लिये सम्पूर्ण भ्रूणपोष का उपयोग कर लेता है, अतः बीज में परिपक्व अवस्था में भ्रूणपोष उपस्थित नहीं होता है, इस प्रकार के बीजों को अभ्रूणपोषी (non- endospermic=exalbuninous) बीज कहते है, जैसे चना, मूँगफली, मटर, सेम इत्यादि। कुछ बीजों में भ्रूण परिवर्धन के समय सम्पूर्ण भ्रूणपोप का उपयोग नही कर पाता है, फलस्वरूप परिपक्व बीज में भ्रूणपोष उपस्थित होता है। अतः इस प्रकार के बीजों को भ्रूणपोषी (endospermic = albuminous) बीज कहते हैं। जैसे-गेहूं, चावल, मक्का इत्यादि ।
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भ्रूणपोष के कार्य (Functions of Endosperm)
(1) भ्रूणपोष की कोशिकाओं में कार्बोहाइड्रेट, वसा एवं प्रोटीन के रूप में भोज्य पदार्थ पाया जाता है जो कि भ्रण परिवर्धन में भ्रूण को पोषण प्रदान करता है।
(2) कुछ पौधों के कोशिकीय भ्रूणपोष में चूषकांग पाये जाते हैं जो कि भ्रूणपोष अथवा उसके बाहर उपस्थित कोशिकाओं से भोजन का चूषण करते है।
(3) बीज के अकुंरण के समय भ्रूणपोष नवोद्भिद् को भोजन प्रदान करता है।
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Question 64 Marks
फ्लोरीकल्चर क्या है? पुंकेसर की संरचना का वर्णन कीजिए। एक प्रारूपिक पुंकेसर का नामांकित चित्र बनाइये।
Answer
पुष्प प्राप्त करने के लिए पुष्पी पाद‌यों को कृषि के द्वारा उगाया जाता है इसे ही पुष्प कृषि या फ्लोरीकल्चर कहा जाता है।
पुंकेसर की संरचना-
पुंकेसर पुष्प का नर प्रजनन अंग होता है। प्रत्येक पुकेंसर में दो भाग होते है- पुतन्तु तथा परागकोश।Image
चित्रः (अ) पुंकेसर के भाग (ब) परागकोश की त्रिविमीय काट
पुतन्तु (Filament) - यह लम्बी धागेनुमा तथा बन्ध्य संरचना होती है।
परागकोश (Anther) - यह शीर्ष पर पायी जाने वाली जननक्षम, घुण्डीनुमा संरचनां होती है।
परागकोश की संरचना (Structure of Anther)
परागकोश मे दो पालियाँ होती हैं, जो एक दूसरे से संयोजी ऊतक के द्वारा जुड़ी रहती हैं। परागकोश की प्रत्येक पाली दो कोष्ठों (द्विकोष्ठी) में विभेदित होती है, जिन्हे परागधानी या लघुबीजाणुधानी (Microsporangium) कहते है। इस प्रकार एक परागकोश में चार लघुबीजाणुधानी पायी जाती है।
माल्वेसी कुल के पादपों (कपास, भिण्डी) में एक पाली ही पायी है ऐसे परागकोश को एककोष्ठीय कहते है तथा इनमें केवल दो लधुबीजाणुधानी ही पायी जाती है।
लघुबीजाणुधानी की संरचना (Structure of microsporangium)
लघुबीजाणुधानी एक बेलनाकार संरचना है जो प्रत्येक परागकोश के दोनों सतहों पर होती है। अनुप्रस्थ काट में लघुबीजाणुधानी वृत्ताकार प्रतीत होते हैं। इसके दो मुख्य भाग होते हैं- परागधानी भित्ति और बीजाणुजनन ऊतक ।
1. परागधानी भित्ति (Microsporangial Wall) -
यह अधःस्तरी (Hypodermal) भित्ति होती है। इसमें 4 परतें होती हैं।
(i) बाह्यत्वचा (Epidermis) - यह परागकोश की सबसे बाहरी परत होती है जिसका मुख्य कार्य सुरक्षा करना होता है।
(ii) अन्तस्थीसियम (Endothecium) - यह बाह्यत्वचा के भीतर उपस्थित भित्ति परत होती है। यह प्रायः एक स्तरीय होती है। इन कोशिकाओं की आंतरिक भित्ति पर सेलुलोज (Cellulose) की रेशेदार पट्टियाँ पायी जाती है। अन्तस्थीसियम की कोशिकाएँ आर्द्रताग्राही प्रकृति की होने के कारण परोगकोश के स्फुटन में मदद कर परागकणों को मुक्त करती है।
(iii) मध्य स्तर (Middle Layer) - ये 1-3 परतों की पतली भित्तिवाली कोशिकाओं की बनी होती है। ये प्रत्येक परागधानी में अन्तस्थीसियम के नीचे पायी जाती है। मध्यस्तर की कोशिकायें प्रायः नष्ट होकर बीजाणुजनन ऊतकों (Sporo- genesis Tissues) का पोषण करती हैं।
(iv) टेपिटम (Tepetum) - यह परागधानी की आन्तरिक एवं विशिष्ट परत होती है। इसकी कोशिकायें बड़ी, लम्बी, बहुकेन्द्रीय एवं अंतःसूत्री विभाजन (Endomitosis) तथा अंतः बहुगुणन द्वारा बहुगुणित हो जाती हैं। टेपीटम दो तरह की होती है।
(a) अमीबाभ (Amoeboid) - इसमें टेपिटम की कोशिकायें बड़ी होकर एवं एक-दूसरे से जुड़कर पेरीप्लाज्मोडिम (Periplasmodium) का निर्माण करती हैं। ये कोशिकायें अमीबा की तरह चलकर बीजाणु मातृ कोशिकाओं के बीच जाकर उन्हें पोषण व अन्य पदार्थ प्रदान करती है। जैसे- टाइफा।
(b) स्रावी या ग्रथिल (Secretory or Glandular) - इसमें टेपिटम की कोशिकायें अपनी भित्तिय अवस्था में बनी रहती है। ये पोषण को स्रावित करके बीजाणुजनन कोशिकाओं तक पहुँचाती हैं। जैसे- द्विबीजपत्री पादप।
टेपिटम के कार्य (Functions of Tapetum) - (i) ये बीजाणुजनन कोशिकाओं को पोषण प्रदान करते हैं। (ii) लघुबीजाणुओं को कैलोज (Callose) के बन्धन से मुक्त करने के लिये कैलोज विकर (Callase Enzyme) प्रदान करते हैं (iii) यह हारर्मोन्स भी स्रावित करती हैं जैसे-IAA हार्मोन्स (iv) टेपिटम की कोशिकाओं से यूबिस कणों (Ubisch Granules) का स्राव होता है जिनमें स्पोरोपोलेनिन (Sporopol. lenin) होती है। इससे परागकणों की बाह्यचोल (Exine) का निर्माण होता है। (v) परागकणों मे यह पोलेनकिट (Pollenkit) आवरण का निर्माण करती है।
2. बीजाणुजनन कोशिकायें (Sporogenous cells) -
परागकोश में भित्ति द्वारा परिबद्ध कोशिकाओं के समूह को बीजाणुजनन कोशिकायें कहते है। ये कोशिकाएँ बाद में पराग मातृ कोशिका का कार्य करती है जो अर्धसूत्री विभाजन करके चार लघुबीजाणु बनाती है। इस प्रक्रिया को लघुबीजाणुजनन कहते हैं।
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Question 74 Marks
बीजाण्ड संक्षिप्त वर्णन कीजिये।
Answer
बीजाण्ड लगभग गोलाकार संरचना होती है जो अण्डाशय में बीजाण्डसन पर बीजाण्ड वृन्त की सहायता से लगी होती है।
हायलम (Hilum) - वह स्थल जहाँ बीजाण्ड वृन्त बीजाण्ड के मुख्य शरीर से जुड़ा रहता है, उसे हायलम कहते हैं।
रेफे (Raphe) - प्रतीप (Anatropous) बीजाण्ड में बीजाण्डवृन्त बीजाण्ड के मुख्य शरीर पर लगकर एक उभार जैसी रचना बनाता है, जिसे रेफे कहते हैं।
बीजाण्डकाय (Nucellus) - बीजाण्ड का मुख्य शरीर मृदुत्तक कोशिकाओं का बना होता है जिसे बीजाण्डकाय कहते हैं।
अध्यावरण (Integument)- बीजाण्डकाय के चारों ओर का आवरण अध्यावरण कहलाता है, इसे बाह्य अध्यावरण व अन्तः अध्यावरण में विभेदित किया जा सकता है।
बीजाण्डद्वार (Mircropyle) - यह बीजाण्ड पर एक छिद्र के रूप में होता है जहाँ पर अध्यावरण नहीं होता, इसे बीजाण्डद्वार कहते हैं।
निभाग (Chalaza) - बीजाण्डद्वार के विपरीत बीजाण्ड के भाग को निभाग कहते हैं।
भ्रूणकोश (Embryosac) - बीजाण्ड के बीजाण्डकाय में एक थैलीनुमा सात कोशिकीय व आठ केन्द्रकीय अगुणित रचना पायी जाती है जिसे भ्रूणकोश कहते है।
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Question 84 Marks
पुष्पी पौधे में परिपक्व भ्रूणकोश के बनने तक गुरूबीजाणु मातृकोशिका के परिवर्धन का वर्णन कीजिए।### मादा युग्मकोद्भिद् के विकास की क्रिया विस्तार से समझाइए। इसका चित्र बनाइए।
Answer
गुरूबीजाणु मातृकोशिकाओं से अर्धसूत्री विभाजन द्वारा अगुणित गुरूबीजाणु बनाने की प्रक्रिया को गुरूबीजाणु जनन कहते हैं। गुरूबीजाणुजनन में चार गुरूबीजाणु बनते हैं जो प्रायः रेखिक चतुष्क रूप में विन्यासित रहते है। इन चार गुरुबीजाणुओं में प्रायः एक गुरुबीजाणु ही सक्रिय रहता है जो मादा युग्मकोद्भिद (भ्रूणकोष) की प्रथम कोशिका होती है। शेष तीन गुरूबीजाणु नष्ट हो जाते है। इस प्रकार एक गुरूबीजाणु से भ्रूणकोष बनने के विकास को एक बीजाणुज (Monosporic) कहते हैं।
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भ्रूणकोश अण्डाकार, बहुकोशिकीय सरंचना होती है। यह बीजाण्डकाय में घंसी होती है। भ्रूणकोश एक पतली पेक्टिन और सेलुलोज की झिल्ली से ढका होता है।
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भ्रूणकोश के अन्दर साधारणतया सात कोशिकायें पायी जाती हैं। एक बड़ी कोशिका मध्य में, तीन बीजाण्डद्वार की तरफ एवं तीन निभाग (Chalaza) की तरफ होती है। बीजाण्ड द्वार (Microphyle) की तरफ पायी जाने वाली कोशिकाओं को सामूहिक रूप से अण्डसमुच्चय तथा निभाग की ओर पायी जाने वाली कोशिकाओं को प्रतिमुखी (Antipodal) कोशिकाये कहते है। सभी कोशिकायें एक-दूसरे से जीवद्रव्य तन्तु द्वारा जुड़ी रहती हैं। इस प्रकार एक भ्रूणकोश में सात कोशिकाये व आठ केन्द्रक होते हैं।
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Question 94 Marks
लघुबीजाणुधानी की संरचना का सचित्र एवं संक्षिप्त वर्णन कीजिये।
Answer
एक परागकोश में चार लघुबीजाणुघानियाँ होती है। प्रत्येक बीजाणुधानी
में बाहर से अन्दर की ओर निम्नलिखित परते होती हैं-
1. अधिचर्म या बाह्यत्वचा (epidermis) - यह सबसे बाहरी व एक कोशिका मोटी परत होती है।Image
2. अन्तस्थीसियम (endothesium) - यह परत बाह्य त्वचा के अन्दर की ओर होती है। यह परागकोश स्फुटन में सहायक होती है।
3. मध्य पर्त या मध्य स्तर (middle layer)- यह दो तीन कोशिका मोटी होती है।
4. टेपीटम (Tapetum)- मध्य स्तर के अन्दर की ओर स्थित होती है तथा यह परिवर्धनशील परागकणों को पोषण प्रदान करने का कार्य करती है।
उपर्युक्त परतों से परिवद्ध लघु बीजाणुधानी में लघुबीजाणु (परागण) भरे होते हैं।
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Question 104 Marks
पराग-स्त्रीकेसर संकर्षण (पारस्परिक क्रिया) को विस्तार से समझाइये।
Answer
परागकण के वर्तिकाग्र पर पहुँचने से लेकर परागनलिका के बीजाण्ड में प्रवेश करने तक की सभी घटनाओं को पराग स्त्रीकेसर संकर्षण (Pollen pistil Interaction) कहते हैं। इस दौरान निम्नलिखित घटनायें होती हैं-
(i) सुयोग्य पराग की पहचान - सुयोग्य पराग की पहचान करने की क्षमता स्त्रीकेसर/वर्तिकाग्र में होती है। यह पहचान स्त्रीकेसर एवं पराग के रासायनिक घटकों की पारस्परिक क्रिया द्वारा होती है। इस पारस्परिक क्रिया में स्त्रीकेसर सुयोग्य पराग को स्वीकृत एवं अयोग्य पराग को अस्वीकृत करती है।
(ii) परागकणों का वर्तिकाग्र पर अंकुरण एवं पर युग्मकोद्भिद का
विकास-
• जब परागकण वर्तिकाग्र पर पहुँचता है तब वह प्रायः दो कोशिकीय (एक कायिक कोशिका एवं एक जनन कोशिका) अवस्था में होता है।
• वर्तिकाग्र के स्रावों से उद्दीपित होकर सुयोग्य रागकण का अंकुरण प्रारम्भ होता है।
• परागकण का अन्तःचोल जनन छिद्र से एक परागनलिका के रूप में बाहर की ओर वृद्धि करता है।
• पराग नलिका में कायिक कोशिका का केन्द्रक नलिका केन्द्रक केरूप में एवं जमन कोशिका दो मर युग्मकों के रूप में आ जाते हैं।
• यह पराग नलिका वर्तिकाग्र व वर्तिका को भेदते हुए अण्डाशय में स्थि बीजाण्ड में बीजाण्डद्वार से प्रवेश करती है।
• पराग नलिका के शीर्ष पर नलिका केन्द्रक एवं दो नर युग्मक होते हैं जिन्ने पराग नलिका एक सहाय कोशिका के तन्तुरूप उपकरण से होते हुए भ्रूणकोश में मुक्त करती है।
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Question 114 Marks
परागनली का बीजाण्ड में प्रवेश करने की विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए। किसी एक विधि का नामांकित चित्र बनाइये।
Answer
जब पराग नलिका अण्डाशय की गुहा (locule) में पहुँच जाती है तो किसी एक बीजाण्ड (ovule) के अन्दर प्रवेश करती है। बीजाण्ड में प्रवेश निम्नलिखित प्रकार से हो सकता है-
1. बी जाण्डद्वारीय प्रवेश (Porogamy) - सामान्यत: ऐनांद्रापस बोजाग में पराग नलिका बीजाण्डद्वार (micropyle) के अन्दर प्रविष्ट जाती है और सीधे (directly) बीजाण्डकाय (nucellus) के अन्दर होती हुई भ्रूणपोष के अन्दर प्रवेश करती है। । यह विधि सर्वथा सामान्य है।
2. निभागीय प्रवेश (chalazogamy) - यह विधि अत्यन्त असामान्य है। इसमें पराग नलिका निभागीय क्षेत्र (chalazal part) या बीजाण्डवृन्त (Fu- nicle) के ऊतक को भेदकर बीजाण्ड के अन्दर प्रवेश करती है। यह विधि सर्वप्रथम केजुयेराइना (Casuarina sp) में देखी गयी।
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3. अध्यावरणीय प्रवेश (mesogamy) - कभी-कभी पराग नलिका बीजाण्ड के अध्यावरणों (integuments) को तोड़कर बीजाण्ड के अन्दर प्रवेश करती है। इस क्रिया को अध्यावरणीय प्रवेश या मीसोगैमी (mesogamy) कहा जाता है। इसके उदाहरण कुकुरबिटेसी (Cucurbitceae) कुल में मिलते हैं।
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Question 124 Marks
स्पष्ट कीजिए -
(i) असंगजनन (Apomixis)
(ii) बहुभूभता (Poly embryony)
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 134 Marks
विवरण दीजिए -
(i) एक बीजपत्री बीज के अनुदैर्ध्य काट का नामांकित चित्र बनाइये।
(ii) द्विबीजपत्री पादपों में भूणपोष का विकास
(iii) गैर-एल्बुमिनस व एल्बुमिनस बीज
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 144 Marks
लघुबीजाणुधानी की अनुप्रस्थ काट का नामांकित चित्र बनाइये तथा परागकण (Pollen Grain) निर्माण प्रक्रिया को संक्षिप्त में लिखिए।
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 154 Marks
निम्नलिखित पर टिप्पणी कीजिए -
(A) लघुबीजाणु जनन,(B) नर युग्मकोद्भिद का विकास
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 164 Marks
निम्नलिखित पर टिप्पणी कीजिए -
(A) गुरुबीजाणु जनन,(B) मादा (स्त्री) युग्मकोद्भिद का विकास
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 174 Marks
परागण के अभिकर्मकों में दो जीविय (प्राणी) व दो अजीवीय कारकों के द्वारा परागण क्रिया को समझाइये।
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 184 Marks
स्वयुग्मन, सजातपुष्पी परागण व परनिषेचन में विभेद कीजिये।
Answer
स्वयुग्मन
1. एक पुष्प के परागकण उसी पुष्प की वर्तिकाग्र पर पहुँचाते हैं तो इसे स्वयुग्मन कहते हैं।
2. इसमें परागण अभिकर्ता की आवश्यकता नहीं होती है।
3. इसमें संततियों में विभिन्नता उत्पन्न नहीं होती है।
सजातपुष्पी परागण परनिषेचन
1.एक पुष्प के परागकण उसी पादप पर लगे किसी दूसरे पुष्प की वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं तो इसे सजातपुष्पी परागण कहते हैं।1.एक पादप पर लगे पुष्प के परागकण उसी जाति के दूसरे पादप पर लगे पुष्प की वर्तिकाग्र पर पहुँचते है तो इसे परनिषेचन कहते हैं।
2.इसमें परागण अभिकर्ता की आवश्यकता होती है।2.इसमें परागण अभिकर्ता की आवश्यकता होती है।
3.इसमें संततियों में विभिन्नता उत्पन्न नहीं होती है।3.इसमें संततियों में विभिन्नता उत्पन्न होती है।
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Question 194 Marks
एक पराग मातृ कोशिका किस प्रकार परागकण में परिवर्तित होती है ? अवस्थाओं का सचित्र प्रदर्शन कीजिए।###आवृत्त बीजियों में सूक्ष्म बीजाणु मातृ कोशिका से एक 3-कोशिका परागकण बनने में होने वाली घटनाओं का क्रमवत् वर्णन कीजिए।
Answer
परागकोश के बीजाणुजन उत्तक (sporogenous tissue) की कोशिकाएं पराग मातृ कोशिका या लघुबीजाणु मातृ कोशिका (microspore mother cell) में परिवर्तित हो जाती है। परागमातृ कोशिकाओं में एक अर्द्धसूत्री कोशिका विभाजन होने से चार अगुणित केन्द्रक बनते हैं, फिर कोशिका द्रव्य विभाजन के फलस्वरूप चार अगुणित कोशिकाएँ बनती हैं, जो प्रायः लघु बीजाणु चतुष्टय या चतुष्क (microspore tetrad) के रूप में व्यवस्थित होती हैं। परागकोश के परिपक्व होने पर चतुष्टय के लघु बीजाणु एक दूसरे से अलग हो जाते हैं, अब इन्हें परागकण (Pollen grains) कहते हैं। परागकण प्रायः 25-50 माइक्रोमीटर व्यास वाले व गोलाकार होते हैं। इनके चारों ओर स्पोरोपोलेनिन का बना बाह्य चोल व सेल्यूलोज तथा पेक्टिन का बना अन्तः चोल होता है। बाह्य चोल में छिद्र पाये जाते हैं जिन्हें जनन छिद्र कहते हैं।Image
परागकण जब परागकोश से बाहर आते हैं तब वे प्रायः (लगभग 60% पादपों में) दो कोशिकीय अवस्था में होते हैं। कुछ पादपों में (लगभग 40% पादपों में) ये तीन कोशिकीय अवस्था में होते हैं। प्रारम्भ में एक कोशिकीय परागकण में जब विभाजन होता है तो इससे दो असमान कोशिकाएं बनती हैं। बड़ी कोशिका को कायिक (Vegetative) तथा तरूपी छोटी कोशिका को जनन कोशिका (Generative cell) कहते हैं। जनन कोशिका शीघ्र ही कायिक कोशिका में समाहित हो जाती है तथा यहाँ यह विभाजित होकर दो नरयुग्मकों (Male gametes) का निर्माण करती हैं।Image
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Question 204 Marks
मक्का के दाने के अनुदैर्ध्य काट का चित्र बनाइए तथा निम्न को नामांकित कीजिए।
(i) फलभित्ति (Pericarp) (ii) प्रशल्क (Scutellum)
(iii) प्रांकुर चोल (Coleoptile) (iv) मूलांकुर (Radicle)
Answer
(i) अनिषेकफलन द्वारा उदाहरण-केला
(ii) बिना निषेचन के बीज निर्माण के दो प्रकार निम्नलिखित हैं-
(a) असंगजनन - कुछ पादपों में बिना अर्द्धसूत्री विभाजन के द्विगुणित अण्ड कोशिका बन जाती है। इस द्विगुणित अण्ड कोशिका से बिना निषेचन के भ्रूण विकसित हो जाता है।
(b) अपस्थानिक भ्रूणता - जब भ्रूण का विकास भ्रूणकोश के अतिरिक्त बीजांड की किसी अन्य कोशिका से होता है तो इस प्रक्रिया को अपस्थानिक भ्रूणता कहते हैं। उपर्युक्त दो युक्तियों से बनने वाले बीज बिना निषेचन के विकसित होते हैं।Image
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Question 214 Marks
बीजों के निर्माण के लिए निषेचन आवश्यक है लेकिन कुछ आवृत्तवीजी बीजों का विकास बिना निषेचन के होता है ?
(i) आवृत्तबीजी का एक उदारण दीजिए जो बिना निषेचन के बीज उत्पन्न करता है। प्रक्रिया का नाम लिखिए।
(ii) उन दो विधियों को समझाइये जिनके द्वारा बिना निषेचन के बीजों का का वि विकास होता है।
Answer
(i) एस्टेरेसी कुल के पादप (जैसे सूर्यमुखी व गेंदा) तथा घासों ने विना निषेचन के ही बीज उत्पन्न करने की प्रक्रिया विकसित कर ली है। प्रक्रिया का नाम-असंगजनन (Apomixis)
(ii) (अ) कुछ प्रजातियों में बिना अर्द्धसूत्री विभाजन के द्विगुणित अण्ड कोशिका बन जाती है जिससे बिना निषेचन के ही भ्रूण विकसित हो जाता है।
(ब) अनेक नींबू वंशीय पादपों व आम की किस्मों में भ्रूणकोश के आस-पास की बीजाण्डकाय (Nucellus) की कोशिकाएं भ्रूण का निर्माण करती है। उपर्युक्त दोनों विधियों (अ एवं ब) द्वारा विना निषेचन के बीजों का विकास
होता है।
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Question 224 Marks
(a) किसी ऐल्बुमिनी बीज के अनुलम्ब काट का एक नामांकित चित्र बनाइए।
(b) पुष्पी पादपों के लिए बीज किस प्रकार लाभकारी होते है।
Answer
(a)
Image
(b) पुष्पी पादपों के लिए बीज निम्नलिखित प्रकार से लाभकारी होते हैं-
(i) नयी संतति निर्माण-बीजों के अंकुरण से पादप की नयी संतति बनती है।
(ii) भ्रूण संरक्षण-बीज का कठोर आवरण बीज में स्थित युवा भ्रूण को संरक्षण प्रदान करता है।
(iii) प्रकीर्णन-बीज वायु, जल, पक्षी व अन्य जन्तुओं द्वारा प्रसारित (प्रकीर्णित) होते हैं। इसके लिए बीजों में विशेष संरचनाएं या अनुकूलन पाये जाते हैं। इससे पादप प्रजातियों का प्रसार नये क्षेत्रों में होता है।
(iv) भोजन संग्रहण-बीजों में पर्याप्त भोजन संग्रहित रहता है। जो अंकुरण एवं नवोद्भिद् के पोषण में काम आता है। जब तक की नवोद्भिद् स्वयं प्रकाश संश्लेषण न करने लग जाये।
(v) गुणन-पुष्पी पादपों में गुणन का एक माध्यम बीज है।
(vi) विभिन्नताएँ-बीज लैंगिक प्रजनन द्वारा उत्पन्न होते हैं, अतः इनमें आनुवांशिक पुनसँयोजन के कारण बहुत सी विभिन्नताएँ भी उत्पन्न होती हैं।
(vii) चिरस्थिरता - बीज भविष्य के पादप को प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाता है। इसमें स्थित प्रसुप्त एवं अक्रियाशील भ्रूण कठोर कवच (बीजावरण) द्वारा संरक्षित रहता है जो लम्बे समय तक जीवनदाय बना रहता है।
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Question 234 Marks
एकबीजपत्री व द्विबीजपत्री बीज में अन्तर लिखिए।
Answer
सजातपुष्पी परागण के अन्तर्गत एक पुष्प के परागकण उसी पादप पर लगे किसी दूसरे पुष्प की वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं। उदा. कुकुरबिट्स (जैसे खीरा)।
एकबीजपत्री बीज द्विबीजपत्री बीज
1.इसमें एक बीजपत्र होता है।1.इसमें दो बीजपत्र होते हैं।
2.इसके भ्रूणपोष में भोजन संचित रहता है।2.इसके बीजपत्रों में भोजन संचित रहता है।
3.इसके प्राकुर व मूलांकुर क्रमशः प्रांकुर चोल व मूलांकुर चोल के संरक्षित रहते हैं।3.इसके प्रांकुर व मूलांकुर संरक्षित नहीं रहते हैं।
4.उदा. गेहूं, चावल, मक्का आदि खाद्यात्र।4.उदा. चना, मटर, सेम आदि
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Question 244 Marks
बीज निर्माण में निषेचन आवश्यक है, लेकिन कुछ आवृत्तबीजी पादपों में बगैर निषेचन के बीज विकसित होते हैं।
(i) आवृत्तबीजी का एक उदाहरण बताइए जिसमें बिना निषेचन के फल का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया का नाम बताइए।
(ii) बिना निषेचन के बीज निर्माण के दो प्रकार समझाइए।
Answer
(i) अनिषेकफलन द्वारा उदाहरण-केला
(ii) बिना निषेचन के बीज निर्माण के दो प्रकार निम्नलिखित हैं-
(a) असंगजनन - कुछ पादपों में बिना अर्द्धसूत्री विभाजन के द्विगुणित अण्ड कोशिका बन जाती है। इस द्विगुणित अण्ड कोशिका से बिना निषेचन के भ्रूण विकसित हो जाता है।
(b) अपस्थानिक भ्रूणता - जब भ्रूण का विकास भ्रूणकोश के अतिरिक्त बीजांड की किसी अन्य कोशिका से होता है तो इस प्रक्रिया को अपस्थानिक भ्रूणता कहते हैं। उपर्युक्त दो युक्तियों से बनने वाले बीज बिना निषेचन के विकसित होते हैं।
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Question 254 Marks
(a) कोई ऐसी चार युक्तियाँ बताइए जो पुष्पी पौधें अपने अन्दर स्वपरागण या ऑटोगेमी को रोकने के लिए अपनाते हैं।
(b) सजात पुष्पीय परागण को आनुवांशिक स्वयुग्मन भी कहा जाता है। क्यों ?
Answer
(a) पुष्पी पादपों में स्वपरागण रोकने की चार युक्तियाँ निम्नलिखित है -
1. भिन्नकालपक्वता - पुष्प के पुंकेसर व स्त्रीकेसर अलग-अलग समय पर परिपक्व होते हैं। उदा. पीपल, गुड़हल।
2. एकलिंगता - एकलिंगी पादप पर या तो नर या मादा पुष्प बनते हैं। अतः स्वपरागण की सम्भावना समाप्त हो जाती है। उदा. पपीता।
3. स्वबंध्यता - एक पुष्प के परागकण उसी पुष्प की वर्तिकाग्र या उसी
पादप पर लगे अन्य पुष्प की वर्तिकाग्र पर पहुँचने पर अंकुरित नहीं हो पाते या परागनली की वृद्धि अवरुद्ध हो जाती है। इसे स्व-असामंजस्य या स्वबंध्यता कहते हैं। उदा. आर्किड (Orchids)
4. हरकोगेमी (herkogamy) - परागकोश व वर्तिकाग्र के बीच प्राकृतिक संरचनात्मक अवरोध होने के कारण एक पुष्प के परागकण उसी पुष्प की वर्तिकाग्र पर नहीं पहुँच पाते ।उदा. आक (Calotropis)
(b) सजातपुष्पीय परागण में एक पुष्प के परागकण उसी पौधे के किसी दूसरे पुष्प की वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं। एक पौधे पर उपस्थित सभी पुष्प आनुवांशिकीय रूप से समान होते हैं, अतः इसे आनुवांशिकीय स्वयुग्मन भी कहा जाता है।
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Question 264 Marks
(a) द्विबीजपत्री पादपों में संलयन के पश्चात् भ्रूण विकास को समझाइए।
(b) भ्रूण के विकास से भ्रूणपोष विकास अग्रतम है, समझाइए।
Answer
(a) द्विबीजपत्री भ्रूण का विकास (Dicot Embryo)-
द्विबीजपत्री पादपों में भ्रूण का अध्ययन हेन्सटीन ने कैप्सेला पादप में किया था। इसमें युग्मनज अनुप्रस्थ विभाजन द्वारा दो कोशिकाएं बनाता है। बीजाण्डद्वार की ओर स्थित कोशिका को आधारी (Basal) कोशिका तथा निभाग की ओर स्थित कोशिका को अग्रस्थ (Apical) कोशिका कहते हैं।
आधारी कोशिका में अनेक अनुप्रस्थ विभाजनो द्वारा 6 से 10 कोशिकायुक्त लम्बी संरचना बनती है, जिसे निलम्बक (Suspensor) कहते हैं। निलम्बक की आधारी कोशिका फूलकर चूपकांग का कार्य करती है तथा अंतिम कोशिका स्फीतिका (Hypophysion) कहलाती है, जो मूलगोप का निर्माण करती है।
इसी दौरान अग्रस्थ कोशिका दो एक दूसरे के समकोण पर अनुदैष्यं विभाजनों द्वारा विभाजित होकर चार भ्रूणीय कोशिकाओं का निर्माण करती है। ये चारों कोशिकायें पुनः एक अनुप्रस्थ विभाजन द्वारा विभाजित होकर आठ कोशिकाओं का अष्टांशक (Octant) बनाती है। इनमें से हाइपोफाइसिस की ओर वाली, चार कोशिकायें हाइपोबेसल (Hypobasal) तथा आगे की चार कोशिकायें एपीबेसल (Epibasal) कोशिकायें होती हैं। हाइपोबेसल कोशिकाओं से मूलांकुर (Epicotyl) व अधोबीजपत्र (Hypocotyl) तथा एपीबेसल कोशिकाओं से प्रांकुर (Plumule) व बीजपत्र (Cotyledon) बनते हैं। भ्रूण वृद्धि के साथ हृदयाकार हो जाता है, जिसकी दोनों पालियों से बीजपत्र बनते हैं।
(b) निषेचन में सत्य संलयन से भ्रूण तथा त्रिसंलयन से. भ्रूणपोष बनता है। हालांकि सत्य संलयन पहले होता है परन्तु सत्य संलयन से बनने वाले भ्रूण को पोषण देने के लिए भ्रूणपोष का विकास पहले होता है। ऐसा होने से ही भ्रूण पोषण प्राप्त करके विकसित हो पाता हैImage
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Question 274 Marks
आवृतबीजी पादप में मादा युग्मकोद्भिद के परिवर्धन का सचित्र वर्णन कीजिए।###एक प्ररूपी आवृतबीजी पादप में गुरुबीजाणु जनन की प्रक्रिया को विस्तार से समझाते हुए परिपक्व भ्रूण कोष का आरेखीय चित्र बनाइये।
Answer
बीजाण्ड या गुरुबीजाणुधानी की संरचना - स्त्रीकेसर के अण्डाशय के अन्दर अनेक छोटी-छोटी अण्डाकार संरचनाएँ पाई जाती हैं। इन संरचनाओं को बीजाण्ड या गुरुबीजाणुधानी कहते हैं। प्रत्येक बीजाण्ड एक वृन्त जैसी संरचना द्वारा अण्डाशय की भीतरी भित्ति पर उपस्थित उभार अथवा बीजाण्डासन से जुड़ा रहता है। बीजाण्ड के वृन्त को बीजाण्डवृन्त कहते हैं। वह स्थान जहाँ बीजाण्डवृन्त बीजाण्ड के साथ जुड़ता है, हाइलम कहलाता है। कभी-कभी बीजाण्डवृन्त के जुड़ने के स्थान पर एक उभरी हुई संरचना होती है जिसे रैफी कहते हैं
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एक प्रारूपिक परिपक्व बीजाण्ड लगभग गोल संरचना होती है। इसका मुख्य शरीर सजीव मृदूतकीय कोशिकाओं से बना होता है जिसे बीजाण्डकाय कहते हैं। प्रायः बीजाण्डकाय एक या दो आवरणों द्वारा घिरा होता है जिन्हें अध्यावरण कहते हैं। बाहरी आवरण को बाह्य अध्यावरण तथा आंतरिक आवरण को अंतः अध्यावरण कहते हैं। अध्यावरणों की संख्या दो होने पर बीजाण्ड द्विअध्यावरणी तथा एक होने पर एकअध्यावरणी कहलाते हैं। अध्यावरण अनुपस्थित होने पर बीजाण्ड अध्यावरण रहित कहलाता है। बीजाण्ड के शीर्ष भाग पर एक छिद्र होता है जिसे बीजाण्डद्वार कहते हैं। बीजाण्ड के आधार भाग को निभाग कहते हैं। बीजाण्डकाय में बीजाण्डद्वार के पास भ्रूणकोश होता है।
गुरुबीजाणुजनन - आवृतबीजी पादपों में बीजाण्ड वस्तुतः गुरुबीजाणुधानी होता है। बीजाण्ड के मुख्य शरीर बीजाण्डकाय में गुरुबीजाणु का विकास होता है। अतः गुरुबीजाणु मातृ कोशिकासे गुरुबीजाणुओं के बनने की प्रक्रिया को गुरुबीजाणुजनन कहते हैं।
विकास के दौरान बीजाण्डकाय में से एक कोशिका आकृति में बड़ी, सघन जीवद्रव्ययुक्त व स्पष्ट केन्द्रक वाली हो जाती है, जिसे गुरुबीजाणु मातृ कोशिका कहते हैं। गुरुबीजाणु मातृ कोशिका अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा चार अगुणित गुरुबीजाणु बनाती है। चारों गुरुबीजाणु रैखिक क्रम में व्यवस्थित होते हैं। इन चार में से प्रायः एक ही गुरुबीजाणु सक्रिय होता है जिससे मादा युग्मकोद्भिद् बनता है, शेष तीन गुरुबीजाणु नष्ट होकर सक्रिय गुरुबीजाणु को पोषण प्रदान करते हैं।
मादा युग्मकोद्भिद् या भ्रूणकोश - सक्रिय गुरुबीजाणु विकसित होकर मादा युग्मकोद्भिद् अर्थात भ्रूणकोश का निर्माण करता है। एक अकेले गुरुबीजाणु से भ्रूणकोश के बनने की विधि को एक-बीजाणुज विकास कहते हैं।
सक्रिय गुरुबीजाणु अगुणित तथा मादा युग्मकोद्भिद् की प्रथम कोशिका है। प्रायः रैखिक चतुष्क में तीन गुरुबीजाणु जो बीजाण्ड द्वार की ओर होते हैं, नष्ट हो जाते हैं परन्तु निभाग की ओर स्थित गुरुबीजाणु सक्रिय होता है। सक्रिय गुरुबीजाणु आकार में बड़ा होने लगता है तथा इसे भ्रूणकोश मातृ कोशिका कहते हैं क्योंकि इसी से भ्रूणकोश का विकास होता है। गुरुबीजाणु के केन्द्रक में तीन सूत्री विभाजन होते हैं जिसके फलस्वरूप आठ केन्द्रक बनते हैं। प्रथम विभाजन द्वारा बने दो केन्द्रकों में से एक-एक केन्द्रक विपरीत ध्रुवों (बीजाण्ड-द्वार तथा निभाग की ओर) पर स्थित हो जाते हैं। प्रत्येक केन्द्रक पुनः दो बार विभाजित होता है जिसके फलस्वरूप प्रत्येक ध्रुव पर अब चार-चार (कुल आठ) केन्द्रक होते हैं। गुरुबीजाणु अब एक थैले की आकृति ले लेता है, जिसे भ्रूणकोश कहते हैं। प्रत्येक ध्रुव पर उपस्थित चार केन्द्रकों में से एक-एक केन्द्रक (कुल दो केन्द्रक) कोशिका के केन्द्र की ओर आकर ध्रुवीय केन्द्रक बनाते हैं। कोशिका के मध्य में आकर दोनों केन्द्रक संयुक्त होकर द्विगुणित केन्द्रक बनाते हैं जिसे द्वितीयक केन्द्रक कहते हैं।
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दोनों ध्रुवों पर शेष तीन-तीन केन्द्रक अपने चारों ओर कोशिका द्रव्य एकत्रित करके कोशिकाओं का निर्माण करते हैं। इसमें बीजाण्डद्वार की ओर स्थित तीन कोशिकायें अण्ड समुच्चय या अण्ड उपकरण का निर्माण करती हैं। इनमें से मध्य भाग में स्थित अण्ड कोशिका, दो सहायक कोशिकाओं से घिरी होती हैं। अण्ड कोशिका में बीजाण्ड द्वार की ओर रिक्तिका और नीचे की ओर केन्द्रक स्थित होता है। इसके दोनों पार्श्वों पर स्थित दो सहायक कोशिकाओं में से प्रत्येक में एक तन्तुरूप उपकरण होता है। यह पराग नलिका को अपनी ओर आकर्षित करता है। सहायक कोशिका में केन्द्रक ऊपर की ओर व रिक्तिका नीचे की ओर होती है।
दूसरे ध्रुव पर (निभाग की ओर) बनने वाली तीन कोशिकायें प्रतिमुखी या प्रतिव्यासांत कहलाती हैं। इस प्रकार से, एक प्ररूपी आवृतबीजी भ्रूणकोश परिपक्व होने पर 8 केन्द्रीय तथा 7 कोशिकीय अवस्था का होता है। इस प्रकार का भ्रूणकोश 70% आवृतबीजी पादपों में पाया जाता है। इस प्रकार के भ्रूणकोश को "पॉलीगोनम प्रकार" का कहते हैं क्योंकि इसे सबसे पहले पॉलीगोनम डाइवेरीकेटम में स्ट्रासबर्गर के द्वारा 1879 में वर्णित किया गया था।

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Question 284 Marks
परागण के विभिन्न अभिकर्मकों को विस्तार से बताइये।###परागण कितने प्रकार का होता है? संक्षिप्त में टिप्पणी लिखिए एवं परागण के किसी एक अजीवीय कारक को उदाहरण सहित समझाइये ।
Answer
पर - परागण में परागकणों को एक पुष्प से दूसरे पौधे पर उपस्थित पुष्प के वर्तिकाग्र पर स्थानांतरित करने के लिये बाहरी साधनों की आवश्यकता होती है। पर परागण के ये साधन कर्मक कहलाते हैं। ये साधन जीवीय या अजीवीय हो सकते हैं। अधिकतर पौधे पर - परागण के लिये जीवीय कारकों का उपयोग करते हैं, अजीवीय कारकों का कम उपयोग होता है। इन साधनों के आधार पर पर परागण अग्र प्रकार का हो सकता है -
(i) वायु परागण - परागकणों का स्थानान्तरण वायु के द्वारा होता है। इस प्रकार के परागण में परागकण का वर्तिकाग्र के सम्पर्क में आना महज संयोगात्मक घटना है। इनमें परागकणों का उत्पादन अधिक संख्या में होता है तथा परागकण छोटे, हल्के, चिकने व शुष्क होते हैं। वायु परागित पुष्पों में वर्तिकाग्र में अनुकूलन पाए जाते हैं। इसमें परागकण सरलता से वायु में उड़ते हैं तथा मादा पुष्प वृहद व पिच्छ वर्तिकाग्र युक्त होते हैं ताकि सरलता से वायु में उड़ते हुए परागकणों को आबद्ध किया जा सके। घास में वर्तिकाग्र पक्ष्माभी, टाइफा में ब्रश की भांति होते हैं। मक्का में वायु परागण होता है। इसके वायु में उड़ते परागकण रेशमी वर्तिकाग्रों (भुट्टे से निकले हुए अनेक रेशमी बाल जैसे) द्वारा पकड़ लिये जाते हैं।
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(ii) जल परागण - जल में डूबे हुये पौधों में अधोजल परागण होता है। उदा. समुद्री घास या जोस्टेरा, सिरेटोफिलम। अनेक जलीय पादपों के पुष्प जल की सतह पर रहकर परागित होते हैं तो इसे अधिजल परागण कहते हैं। उदा.-वेलिस्नेरिया, पोटेमोजिटोन में परागण वायु द्वारा होता है। निम्फिया भी जलीय पादप है परन्तु इसमें कीट परागण होता है।
(iii) कीट परागण - मधुमक्खियाँ, मक्खियाँ, पतंगा, तितली, वैस्प, बीटल आदि कीट परागण में सहायता करते हैं। यह माना जाता है कि 80% कीट परागण मधुमक्खियों के द्वारा होता है। जिन पौधों के पुष्पों में कीट परागण होता है वे रंगीन, चमकदार, गंधयुक्त तथा मकरंदयुक्त होते हैं।
(iv) पक्षी परागण - विभिन्न प्रकार के उष्ण कटिबंधीय पौधों में पक्षी परागण होता है। इनके पुष्प प्यालेनुमा (उदा.-कैलीस्टेमोन), नलिकाकार (उदा.- निकोटिआना) या कुंभाकार (उदा.-एरीकेसी कुल के पादप) होते हैं। इन पौधों के पुष्प चमकदार, आकर्षक तथा मकरंदयुक्त होते हैं। मकरंद से आकर्षित होकर आए पक्षियों की चोंच व शरीर से पराग कण चिपक जाते हैं तथा इनके साथ ही अन्य पौधों तक पहुँच जाते हैं।
(v) चमगादड़ परागण - कुछ पादपों में पुष्प रात्रि में खिलते हैं तथा अत्यधिक मात्रा में मकरंद स्रावित करते हैं। चमगादड़ निशाचर प्रवृत्ति के होने के कारण इन पौधों के परागण में सहायक होते हैं। उदा. कचनार, गोरख इमली, कदम्ब, बालमखीरा इत्यादि ।
इसके अतिरिक्त सर्पवृक्ष और ऑर्किड में घोंघे के द्वारा तथा गुलमोहर व सेमल में गिलहरी के द्वारा परागण होता है।
नोट - कीट परागण के अन्तर्गत कुछ इस प्रकार के उदाहरण भी हैं जो अंडा देने का सुरक्षित स्थान बना लेते हैं। उदा.- एमोरफोफेलस में पुष्प बहुत लम्बा (लगभग 6 फुट) होता है, जिसमें अंडा सुरक्षित रहता है। इसी प्रकार शलभ की एक जाति प्रोनूबा व युक्का में सह-संबंध होता है। प्रोनूबा की मादा परागण हेतु विशेष कार्य करती है। युक्का के पुष्प घंटाकार व उल्टे लटके हुए होते हैं। वर्तिका पुंकेसरों से लम्बी तथा वर्तिकाग्र प्याले की जैसे तथा नीचे की ओर लटके रहते हैं। इस प्रकार से इस पुष्प के परागकण इसी के वर्तिकाग्र पर नहीं गिर सकते हैं। मादा शलभ परागकण अपने मुँह में एकत्रित कर, पुष्प के अन्दर घुसकर पुष्प के अण्डाशय के भीतर अपने अण्डे रखती है। अण्डे रखने के बाद शलभ वर्तिका से होती हुई वर्तिकाग्र पर पहुँच कर अपने मुँह में रखे परागकणों को उगल देती है।
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Question 294 Marks
(i) परागण को परिभाषित कीजिए।
(ii) दोहरा निषेचन को समझाइए।
(iii) निषेचित भ्रूण कोश की संरचना का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer
(i) परागण - परागकणों के परागकोश से मुक्त होकर जायांग के वर्तिकाग्र (stigma) तक पहुँचने की प्रक्रिया को परागण कहते हैं। परागण मुख्यतः दो प्रकार से होता है- 1. स्व-परागण तथा 2. पर-परागण ।
(ii) दोहरा निषेचन - भ्रूणकोष में अण्डकोशिका तथा एक नर युग्मक के संलयन को युग्मक संलयन अथवा सत्य निषेचन अथवा प्रथम निषेचन कहते हैं। इसके फलस्वरूप द्विगुणित युग्मनज बनता है। दूसरा नर युग्मक द्वितीयक केन्द्रक (दो ध्रुवीय केन्द्रकों के संयोजन से निर्मित) से संयोजित होकर द्विगुणित प्राथमिक भ्रूणपोष केन्द्रक बनाता है। इस प्रक्रिया को त्रिक संलयन कहते हैं, क्योंकि इससे तीन अगुणित $(n)$ केन्द्रकों का संलयन होता है।
$\quad$आवृत्तबीजियों में निषेचन की प्रक्रिया दो बार होती है। एक नर युग्मक अण्ड कोशिका से तथा दूसरा ध्रुवीय केन्द्रक से संयोजित होता है। अतः युग्मक संलयन एवं त्रिक संलयन की घटना को सम्मिलित रूप से द्विनिषेचन अथवा दोहरा निषेचन कहते हैं।
$\quad$द्विनिषेचन का अध्ययन सबसे पहले नवाश्चिन (1898) ने क्रिटिलेरिया एवं लिलियस नामक पौधों में किया। द्विनिषेचन /दोहरा निषेचन आवृतबीजी पादपों का एक महत्त्वपूर्ण लक्षण है। आवृतबीजी के अतिरिक्त अन्य किसी पादप वर्ग में यह नहीं पाया जाता है। त्रिसंलयन के पश्चात् केन्द्रीय कोशिका प्राथमिक भ्रूणपोष कोशिका बन जाती है तथा भ्रूणपोष के रूप में विकसित होती है जबकि युग्मनज एक भ्रूण के रूप में विकसित होता है।
$\quad$विभिन्न पादपों में परागण एवं निषेचन में मध्य 2 - 25 घण्टे का अन्तराल होता है एवं त्रिक संलयन, युग्मज संलयन से सामान्यतः पहले होता है।
(iii) निषेचित भ्रूण कोश की संरचना -
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Question 304 Marks
निषेचन पश्च घटना क्या है? पादप भ्रूणपोष की संरचना का वर्णन कीजिए। एक द्विबीजपत्री भ्रूण की संरचना का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer
निषेचन - पश्च घटना निषेचन क्रिया होने के पश्चात् भ्रूण व भ्रूणपोष का विकास होता है। विकास के अगले घटनाक्रम में बीजाण्ड परिपक्व होकर बीज में बदलने तथा अंडाशय फल के रूप में विकसित होने की सभी घटनाओं को सामूहिक रूप से निषेचन - पश्च घटना कहा जाता है।
भ्रूणपोष की सरंचना - भ्रूणपोष का विकास भ्रूण विकास के रूप में बढ़ता है। क्यों? प्राथमिक भ्रूणपोष कोशिका बार-बार विभाजित होती है तथा एक त्रिगुणित भ्रूणपोष ऊतक की रचना करती है। इन ऊतकों की कोशिकाएँ संरक्षित खाद्य सामग्री से पूरित होती हैं और विकासशील भ्रूण की पोषकता के लिए उपयोग की जाती हैं। सर्वाधिक सामान्य प्रकार के प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक नामक भ्रूणपोष विकास उत्तरोत्तर केंद्रकी (न्युक्लियर) विभाजन से गुजरकर मुक्त न्युक्ली (केंद्रकी) के रूप में पैदा होता है। भ्रूणपोष के विकास की इस अवस्था को फ्रीन्युक्लियर इंडोस्पर्म अर्थात् मुक्त केंद्रकी भ्रूणपोष कहते हैं। इसके सापेक्ष ही कोशिका भित्ति रचना स्थान लेती है और भ्रूणपोष कोशकीय बन जाता है। कोशिकीकरण से पहले मुक्त न्युक्लीआइयों की संख्याओं में व्यापक भिन्नता होती है। एक कच्चे नारियल का पानी, यह मुक्त केंद्रकी भ्रूणपोष होता है जो कि हजारों न्युक्ली से बना होता है और इसके आस-पास का सफेद गूदा (गिरी) कोशकीय भ्रूणपोष होता है।
बीज के परिपक्व होने से पहले भ्रूणपोष पूरी तरह से विकाशसील भ्रूण (जैसे-मटर, मूँगफली, सेम आदि) द्वारा उपभोग कर लिया जाता है या फिर परिपक्व बीज में विद्यमान रहता है (जैसे-अरंडी और नारियल) और इसे बीज अंकुरण के समय इस्तेमाल किया जाता है। इन्हें अभ्रूणपोषी कहते हैं। कुछ बीजों में भ्रूणपोष बचा रहता है, इन्हें भ्रूणपोषी या एल्यूमिनी बीज कहते हैं, उदाहरण-गेहूं, चावल तथा मक्का।
द्विबीजपत्री भ्रूण की संरचना का नामांकित चित्र -
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Question 314 Marks
फ्लोरीकल्चर क्या है? पुंकेसर की संरचना का वर्णन कीजिए। एक प्रारूपिक पुंकेसर का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer
फ्लोरीकल्चर - फ्लोरीकल्चर का अर्थ है -बागवानी यानि फूलों की खेती। इसमें फूलों के पादपों का अध्ययन किया जाता है, यह हार्टिकल्चर की एक शाखा है जिसमें फूलों की पैदावार, देखभाल और मार्केटिंग के बारे में अध्ययन किया जाता है।
$\quad$पुंकेसर की सरंचना - पुंकेसर अथवा लघुबीजाणुपर्ण आवृतबीजी पौधों के नर जननांग होते हैं। प्रत्येक पुंकेसर के तीन भाग होते हैं - (i) परागकोष, (ii) पुंतन्तु तथा (iii) संयोजी। पुंतन्तु, पुंकेसर का लम्बा व पतला वृन्त होता है, इसका सीमपस्थ छोर पुष्प के पुष्पासन या पुष्प दल से जुड़ा होता है। पुंतन्तु के ऊपर फैला हुआ सिर परागकोष होता है। यह पुंतन्तु के अग्रक से बनता है। पुंकेसरों की संख्या एवं लम्बाई विभिन्न प्रजाति के पुष्पों में भिन्न होती है।
$\quad$प्रारूपतः परागकोष में दो पालियाँ होती हैं जो एक - दूसरे से संयोजी द्वारा जुड़ी होती हैं। संयोजी एक बन्ध्य ऊतक होता है। परागकोष की प्रत्येक पालि में दो लघुबीजाणुधानियाँ अथवा परागकोष होते हैं। इस प्रकार प्रत्येक परागकोष में चार कक्ष होते हैं। कुछ पौधों जैसे भिण्डी, गुड़हल आदि में केवल दो और कभी - कभी एक ही कक्ष पाया जाता है। ऐसे परागकोष जिनमें केवल एक पालि होती है, उन्हें एककोष्ठी कहते हैं तथा इन परागकोषों में केवल दो लघुबीजाणुधानियाँ होती हैं। लघुबीजाणुधानियों में बहुत महीन पाउडर जैसे परागकण या लघुबीजाणु भरे होते हैं।
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Question 324 Marks
स्व-अयोग्यता क्या है? स्व-अयोग्यता वाली प्रजातियों में स्व-परागण प्रक्रिया बीज की रचना तक क्यों नहीं पहुंच पाती है?
Answer
प्रकृति में कुछ पौधों में दूसरे पादपों से प्राप्त परागकणों के द्वारा ही निषेचन की प्रक्रिया सम्पन्न होती है। इनका बीजाण्ड स्वयं के परागकणों के द्वारा निषेचित नहीं होता है। प्रकृति में इसके लिये पुष्पों के अनेक प्रकार के अनुकूलन लक्षण जैसे एकलिंगता (unisexuality), भिन्नकाल पक्वन (dichogamy) तथा हरकोगेमी (herkogamy) इत्यादि के रूप में प्रदान किये हैं। इन अनुकूलन विशेषताओं के कारण पौधों में स्वपरागण की प्रक्रिया नहीं हो पाती है। परन्तु इन सभी कारणों से बढ़कर स्व-अयोग्यता या स्व-अनिषेच्यता (self - incompatibility) एक ऐसा कारण है, जिनके द्वारा प्राकृतिक रूप से पर-परागण या पर-प्रजनन की प्रक्रिया को प्रोत्साहन प्राप्त होता है। स्व-अनिषेच्यता से हमारा तात्पर्य एक ही पौधे से उत्पन्न कार्यशील नर एवं मादा युग्मकों के आपस में संयोजित होने की विफलता एवं बीज निर्माण का नहीं हो पाना है। अन्य शब्दों में, किसी पुष्प में स्वपरागण एवं निषेचन की क्रिया का बाधित होना स्व-अयोग्यता या स्व-अनिषेच्यता कहलाता है। आकारिकी रूप से स्व-अनिषेच्यता दो प्रकार की होती है -
(i) विषमरूपी (Heteromorphic) - जब एक ही प्रजाति में दो या तीन प्रकार की वर्तिकाओं के आकारिकीय रूप से विभेदित पौधे पाये जाते हैं तो इस प्रकार के आकारिकीय रूप से भिन्न एक ही प्रजाति के पादप स्व-अनिषेच्यता प्रदर्शित करते हैं। यह स्थिति प्रिमरोज (Primrose) के पौधों में पाई जाती है। इसका मुख्य कारण पुष्पों में विषमवर्तिकाग्रता (Heterostyly) होती है। इस पादप प्रजाति में दो प्रकार के पुष्प पाये जाते हैं - (अ) पिन - आइड पुष्प (Pin - eyed flower) - इन पुष्पों में वर्तिका लम्बी एवं पुंकेसर छोटे होते हैं। अतः एक ही पुष्प के परागकण इसकी वर्तिका पर नहीं पहुंच पाते हैं। (ब) थ्रम - आइड पुष्प (Thrum - eyed flowers) - इन पुष्पों में पुंकेसर एवं परागकण बड़े तथा वर्तिकाग्र वर्तिका छोटे होते हैं।
(ii) समरूपी अनिषेच्यता (Homomorphic incompatibility) - इस प्रकार की स्वनिषेचन विफलता या अनिषेच्यता एक ही प्रजाति के एवं आकारिकी रूप से समान पौधों के बीच पाई जाती है।
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Question 334 Marks
पुष्पों द्वारा स्व-परागण रोकने के लिये विकसित की गई दो कार्यनीति का विवरण दें।
Answer
कुछ पौधों के पुष्पों में दोनों लिंग अर्थात् पुंकेसर व जायांग स्थित होने के बावजूद भी इस प्रकार की कार्यनीति होती है जिसके कारण उनमें स्वपरागण नहीं हो पाता है। यहाँ इस प्रकार की दो कार्यनीति का विवरण दिया जा रहा है -
1. एकलिंगता (Unisexuality or Dicliny) - कुछ पौधों में पुष्प एकलिंगी होते हैं। ऐसे पुष्पों में या तो पुंकेसर या जायांग होता है। जिन पुष्पों में केवल पुंकेसर होते हैं उन्हें पुंकेसरी (Staminate) और जिन पुष्पों में केवल अण्डप (जायांग) ही मिलते हैं उन्हें स्त्रीकेसरी (Pistillate) कहते हैं, उदाहरण - पपीता ।
2. स्वबंध्यता (Self-sterility) - कुछ पौधों में एक पुष्प का परागकण उसी पुष्प की वर्तिकाग्र पर पहुँचने पर भी अंकुरित नहीं होता है। इस प्रकार के परागण में अण्डप भी उद्दीप्त नहीं होता है। इस दशा को स्वबंध्यता कहते हैं, उदाहरण - राखीबेल (Passiflora), अंगूर (Vitis) एवं सेब (Malus)। स्वबंध्यता एक पैतृक गुण है। ऐसा माना जाता है कि जब स्व-परागण होता है तो वर्तिका तथा वर्तिकाग्र की कोशिकाओं से कुछ ऐसे रासायनिक यौगिक स्रावित होते हैं जिसके फलस्वरूप परागण निष्फल हो जाता है। इन रासायनिक प्रक्रियाओं के कारण निम्नलिखित प्रभाव हो सकते हैं -
(i) परागकोश से परागनली निकलते ही नष्ट हो जाती है।
(ii) परागकण से निकली परागनली बहुत ही मंद वृद्धि करती है और पर-परागण द्वारा आए हुए परागकण की परागनली बीजाण्ड में पहले पहुँच जाती है।
(iii) वर्तिका में बढ़ती हुई परागनली वापस ऊपर की ओर मुड़ जाती है।
(iv) वर्तिका और वर्तिकाग्र मुर्झा कर नष्ट हो जाते हैं। ये सभी प्रभाव स्व-परागण को रोकते हैं। इस कारण ऐसे पुष्पों में सदैव पर - परागण होता है। आर्किड, माल्वा और चाय की जातियों में स्वबंध्यता मिलती है।
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Question 344 Marks
एक स्पष्ट एवं साफ - सुथरे चित्र के द्वारा परिपक्व मादा युग्मकोद्भिद् के 7- कोशीय, 8 - न्यूक्लियेट (केन्द्रक) प्रकृति की व्याख्या करें।
Answer

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सक्रिय गुरुबीजाणु अगुणित तथा मादा युग्मकोद्भिद की प्रथम कोशिका होती है अर्थात् सक्रिय गुरुबीजाणु से ही मादा युग्मकोद्भिद का निर्माण होता है। इसी कोशिका को भ्रूणकोश मातृ कोशिका भी कहते हैं। सक्रिय गुरुबीजाणु आकार में बढ़ता है जिससे इसमें छोटी - छोटी रिक्तिकायें प्रकट हो जाती हैं। गुरुबीजाणु के केन्द्रक में तीन समसूत्री विभाजन होने से आठ केन्द्रक बनते हैं। प्रथम विभाजन से बने दो केन्द्रकों में से एक - एक केन्द्रक विपरीत ध्रुवों (बीजाण्डद्वार तथा निभाग की ओर) पर स्थित हो जाते हैं। प्रत्येक केन्द्रक पुनः दो बार विभाजित होकर चार - चार केन्द्रक बनाते हैं, अर्थात् कुल आठ केन्द्रक हो जाते हैं। धीरे - धीरे गुरुबीजाणु आकृति में बढ़कर एक थैले के समान हो जाता है, जिसे भ्रूणकोश (Embryo-sac) कहते हैं। इसमें प्रत्येक ध्रुव पर चार - चार केन्द्रक होते हैं। दोनों ध्रुवों से एक-एक केन्द्रक कोशिका के केन्द्र की ओर आने लगते हैं, इन केन्द्रकों को ध्रुवीय केन्द्रक (Polar nuclei) कहते हैं। ये दोनों केन्द्रक कोशिका के मध्य में आकर संयुक्त होकर द्विगुणित द्वितीयक केन्द्रक (Secondary nucleus) बनाते हैं। अब दोनों ध्रुवों पर शेष रहे तीन-तीन केन्द्रक अपने चारों ओर कोशिका द्रव्य एकत्रित करके कोशिकाओं का निर्माण करते हैं। बीजाण्डद्वार की ओर स्थित कोशिकाएँ अण्ड समुच्चय या अण्ड उपकरण (Egg Apparatus) का निर्माण करती हैं। अण्ड समुच्चय में एक अण्ड कोशिका तथा शेष दो सहायक कोशिकाएँ (Synergids) होती हैं। दूसरे ध्रुव अर्थात् निभाग की ओर वाली तीनों कोशिकाएँ प्रतिमुखी कोशिकाएँ (Antipodal cells) बनाती हैं। इस प्रकार एक गुरुबीजाणु मादा युग्मकोद्भिद (Female gametophyte) या भ्रूणकोश (Embryo - sac) का निर्माण करता है। अधिकांश आवृतबीजी पादपों में भ्रूणकोश का विकास इसी प्रकार का होता है।
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Question 354 Marks
एक प्ररूपी आवृतबीजी बीजाण्ड के भागों का विवरण दिखाते हुए एक स्पष्ट एवं साफ-सुथरा नामांकित चित्र बनाएँ।
Answer
बीजाण्ड की संरचना इसके अनुदैर्ध्य काट के अध्ययन से अधिक स्पष्ट हो जाती है। बीजाण्ड एक गोलाकार संरचना होती है जो कि बीजाण्डासन (Placenta) के साथ बीजाण्ड वृन्त (Funicle) द्वारा जुड़ी रहती है। बीजाण्डकाय का वह स्थान जहाँ पर बीजाण्ड वृन्त जुड़ा रहता है, नाभिक (Hilum) कहलाता है। सामान्यतः पाया जाने वाला प्रतीप (Anatropous) बीजाण्ड में बीजाण्ड वृन्त, नाभिका से ऊपर बीजाण्ड की काय (Body) के साथ चलकर एक कटक (Ridge) बनाता है जिसे रैफी (Raphe) कहते हैं। बीजाण्ड की काय का आधार जहाँ से अध्यावरण निकलते हैं, निभाग (chalaza) कहलाता है। बीजाण्ड का मुख्य शरीर एक बीजाण्डकाय (Nucellus) का बना होता है, जिसमें एक भ्रूण कोश (Embryo sac) रहता है। बीजाण्डकाय प्रायः एक या दो आवरणों से घिरा रहता है जिन्हें अध्यावरण कहते हैं। बाहरी आवरण को बाह्य अध्यावरण (outer integument) तथा अन्दर वाले आवरण को अन्तः अध्यावरण (inner integument) कहते हैं। बीजाण्ड पर अध्यावरणों की संख्या दो होने पर द्विअध्यावरणी (bitegmic) तथा एक होने पर एकअध्यावरणी (unitegmic) बीजाण्ड कहते हैं। कुछ बीजाण्डों में अध्यावरण अनुपस्थित होता है, तब बीजाण्ड को अध्यावरण रहित (ategmic) कहते हैं। अध्यावरण बीजाण्डकाय को चारों ओर से घेरे रहते हैं और सिर्फ एक संकरा द्वार बनाते हैं, जिसे बीजाण्डद्वार (Micropyle) कहते हैं। बीजाण्ड का बीजाण्डद्वार पराग नलिका को बीजाण्ड में प्रवेश देता है।
बीजाण्डकाय में बीजाण्डद्वार के समीप भ्रूणकोश (embryo sac) पाया जाता है। भ्रूणकोश में सात कोशिकायें उपस्थित होती हैं। बीजाण्डद्वार की ओर स्थित तीन कोशिकायें अण्ड उपकरण या अण्ड समुच्चय (egg apparatus) बनाती हैं। अण्ड उपकरण में स्थित बीच की कोशिका बड़ी व नाशपाती आकार की अण्डकोशिका (egg cell) होती है व शेष दो पार्श्व स्थित कोशिकायें सहायक कोशिकायें (synergids) होती हैं। निभाग की ओर स्थित तीन कोशिकायें प्रतिमुखी कोशिकायें (antipodal cells) होती हैं। भ्रूणकोश के मध्य केन्द्रीय कोशिका (central cell) उपस्थित होती है, जिसमें दो अगुणित ध्रुवीय केन्द्रक (polar nuclei) उपस्थित होते हैं। ध्रुवीय केन्द्रक बाद में संयुक्त होकर द्विगुणित (2n) द्वितीयक केन्द्रक (secondary nucleus) बनाते हैं।
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Question 364 Marks
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उपरोक्त चित्र में कोमेलाइना (कनकोआ) पौधों में दो प्रकार के पुष्प दर्शाए गए हैं।
(i) चित्र में नामांकित 'A' तथा 'B' दो प्रकार के पुष्पों को पहचानिए।
(ii) निम्नलिखित के संदर्भ में दो प्रकार के पुष्पों की तुलना कीजिए -
(1) विशिष्ट अभिलक्षण
(2) परागण का तरीका
(iii) पुष्पी पादपों में दो 'बहिः प्रजनन युक्तियों' की सूची बनाइए। पौधे इस प्रकार की युक्तियाँ क्यों विकसित करते हैं, व्याख्या कीजिए।
Answer
(i) चित्र में नामांकित A पुष्प उन्मील परागणी पुष्प है तथा B पुष्प अनुन्मील्य परागणी पुष्प है।
(ii) (1) विशिष्ट लक्षण के आधार पर अनुन्मील्य पुष्प एवं उन्मील परागणी पुष्प में तुलना -
क्र.सं.अनुन्मील्य पुष्पउन्मील पुष्प
1.पुष्प बंद होते हैं।जबकि ये पुष्प खुले होते हैं।
2.ये पुष्प भूमिगत होते हैं।जबकि उन्मील पुष्प पादप के वायव भाग पर स्थित होते हैं।
3.पुष्प सफेद अथवा रंगहीन होते हैं।पुष्प रंगीन होते हैं।
4.इनमें एंथर एवं स्टिगमा कभी उजागर नहीं होते हैं।जबकि इनमें एन्थर एवं स्टिगमा उजागर होते हैं।
(2) परागण के तरीके के आधार पर अनुन्मील्य पुष्प एवं उन्मील पुष्प में अन्तर -
क्र.सं.अनुन्मील्य पुष्पउन्मील पुष्प
1.इनमें स्वपरागण होता है।इनमें स्वपरागण अथवा परपरागण होता है।
2.इनमें स्वपरागण हेतु परागण एजेन्ट/कारक की आवश्यकता नहीं होती है।जबकि इनमें परागण एजेन्ट /कारक की आवश्यकता होती है।
(iii) 1. स्वबन्हयता 2. एक लिंगता।
पुष्पी पादपों ने स्वनिषेचन को हतोत्साहित करने और क्रॉस परागण को प्रोत्साहित करने के लिए आउटब्रीडिंग युक्तियाँ विकसित कर ली हैं।
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Question 374 Marks
बीज कितने प्रकार के होते हैं? इनकी संरचना को समझाइये।
Answer
बीजपत्र के आधार पर बीज दो प्रकार के होते हैं - (i) एकबीजपत्री तथा (ii) द्विबीजपत्री। भ्रूणपोष की उपस्थिति व अनुपस्थिति के आधार पर भी बीज दो प्रकार के होते हैं - (i) भ्रूणपोषी बीज तथा (ii) अभ्रूणपोषी बीज।
एकबीजपत्री बीज - इनमें केवल एकबीजपत्र होता है। घास परिवार में बीजपत्र को प्रशल्क कहते हैं तथा यह ढाल के आकार का होता है। प्रशल्क भ्रूणीय अक्ष के एक तरफ (पार्श्व की ओर) स्थित होता है। इसके निचले सिरे पर भ्रूणीय अक्ष में एक गोलाकर और मूल आवरण एक बिना विभेदित पर्त से आवृत होता है जिसे मूलांकुर चोल कहते हैं। प्रशल्क के जुड़ाव के स्तर से ऊपर, भ्रूणीय अक्ष के भाग को बीजपत्रोपरिक कहते हैं। बीजपत्रोपरिक में प्ररोह शीर्ष तथा कुछ आदिकालिक पर्ण होते हैं, जो एक खोखली पर्णीय संरचना को घेरते हैं, जिसे प्रांकुरचोल कहते हैं।बीजपत्र के आधार पर बीज दो प्रकार के होते हैं - (i) एकबीजपत्री तथा (ii) द्विबीजपत्री। भ्रूणपोष की उपस्थिति व अनुपस्थिति के आधार पर भी बीज दो प्रकार के होते हैं - (i) भ्रूणपोषी बीज तथा (ii) अभ्रूणपोषी बीज।
एकबीजपत्री बीज - इनमें केवल एकबीजपत्र होता है। घास परिवार में बीजपत्र को प्रशल्क कहते हैं तथा यह ढाल के आकार का होता है। प्रशल्क भ्रूणीय अक्ष के एक तरफ (पार्श्व की ओर) स्थित होता है। इसके निचले सिरे पर भ्रूणीय अक्ष में एक गोलाकर और मूल आवरण एक बिना विभेदित पर्त से आवृत होता है जिसे मूलांकुर चोल कहते हैं। प्रशल्क के जुड़ाव के स्तर से ऊपर, भ्रूणीय अक्ष के भाग को बीजपत्रोपरिक कहते हैं। बीजपत्रोपरिक में प्ररोह शीर्ष तथा कुछ आदिकालिक पर्ण होते हैं, जो एक खोखली पर्णीय संरचना को घेरते हैं, जिसे प्रांकुरचोल कहते हैं।
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द्विबीजपत्री बीज - बीज एक या दो आवरणों से ढका होता है, जिन्हें बीजावरण या बीजचोल कहते हैं। बाह्य बीजावरण को टेस्टा व अन्तःबीजावरण को टेगमेन कहते हैं। कुछ बीजों में केवल एक ही बीजचोल मिलता है। बाहरी आवरण मोटा व कठोर जो प्रतिकूल परिस्थितियों और प्रसुप्ति काल में भ्रूण की सुरक्षा करता है। टेगमेन या अन्तः चोल पतला होता है।
द्विबीजपत्री बीज में दो बीजपत्र होते हैं। दोनों बीजपत्र भ्रूणाक्ष के साथ पार्श्व में लगे होते हैं और भ्रूणाक्ष मध्य में होता है। बीजपत्र के स्तर से ऊपर भ्रूणीय अक्ष या भ्रूणाक्ष का भाग बीजपत्रोपरिक होता है जो प्रांकुर या स्तम्भशीर्ष बनाता है। बीजपत्रों के स्तर से नीचे भ्रूणीय अक्ष का भाग बीजपत्राधार होता है जिससे मूल शीर्ष या मूलांकुर बनता है। उन बीजपत्रों में जिनमें भ्रूणपोष नहीं पाया जाता है, बीजपत्र भ्रूणपोष को सोख कर मोटे और गूदेदार हो जाते हैं। कुछ बीजों में बीजपत्र अंकुरण काल में भूमि से ऊपर आ जाते हैं और हरे होकर, प्रथम पत्तियों के बनने तक प्रकाश-संश्लेषण कर पादप के लिये खाद्य बनाते हैं।
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भ्रूणपोषी व अभ्रूणपोषी बीज - कुछ बीजों में भ्रूण एक विशेष प्रकार के मृदूतकी ऊतक द्वारा परिबद्ध रहता है। इस ऊतक की कोशिकाओं में प्रचुर मात्रा में खाद्य संग्रहित रहता है। यह खाद्य विकसित होकर भ्रूण को पोषण प्रदान करता है, इसी कारण इसे भ्रूणपोष कहते हैं। इस प्रकार के बीज जिनमें भ्रूणपोष उपस्थित रहता है, उन बीजों को भ्रूणपोषी या एल्बुमिनिस बीज कहते हैं। अधिकांश एकबीजपत्री पौधों जैसे गेहूँ, मक्का, धान, बाजरा और कुछ द्विबीजपत्री बीज जैसे - अरण्ड आदि भ्रूणपोषी बीज होते हैं। बीज के अंकुरण के समय प्रथम मूल व प्रथम पर्णों के बनने तक भ्रूण को पोषण भ्रूणपोष से मिलता है। कुछ पौधों जैसे - चना, मटर, सेम, लौकी, इमली, अमरूद व सूर्यमुखी के बीजों में भ्रूणपोष का अभाव होता है, क्योंकि इनका भ्रूण विकास के दौरान सम्पूर्ण भ्रूणपोष का उपयोग कर लेता है। ऐसे बीजों को अभ्रूणपोषी या गैर-एल्बुमिनिस बीज कहते हैं। अभ्रूणपोषी बीजों में खाद्य का संग्रह बीजपत्र में होता है, अतः ये मोटे व गूदेदार होते हैं।
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Question 384 Marks
आवृतबीजी पादप में नर युग्मकोद्भिद के परिवर्धन का सचित्र वर्णन कीजिए।
Answer
लघुयुग्मकजनन या नर युग्मकोद्भिद् का विकास - परागकण से पूर्ण विकसित नर युग्मकोद्भिद् बनने तक के क्रम को लघुयुग्मकजनन कहते हैं। वस्तुतः नर युग्मकोद्भिद् का विकास परागकोश के अन्दर ही प्रारम्भ हो जाता है। लघुयुग्मकजनन के दौरान होने वाले सभी केन्द्रकीय विभाजन सूत्री विभाजन  होते हैं।
प्रारम्भ में लघुबीजाणु का जीवद्रव्य गाढ़ा एवं केन्द्रक सुस्पष्ट होता है। जैसे ही ये चतुष्क से पृथक् होते हैं, वैसे ही परागकण का आकार तेजी से बढ़ता है जिससे रसधानियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। परागकण में समसूत्री विभाजन होने से दो असमान कोशिकायें बनती हैं। इसमें बड़ी कोशिका कायिक कोशिका तथा छोटी कोशिका जनन कोशिका होती है।
कायिक एवं जनन कोशिका की संरचना -
$\quad$कायिक कोशिका - इसका केन्द्रक बड़ा, गोलाकार, अनियमित होता है। कोशिका का आकार बड़ा होता है तथा रसधानियाँ नहीं होतीं। केन्द्रक में केन्द्रिक का अभाव होता है तथा RNA व प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है।
$\quad$जनन कोशिका - प्रारम्भ में यह कोशिका मसूराकार होती है परन्तु धीरे-धीरे यह लम्बी होकर कृमिरूपी दिखाई देने लगती है। इसमें कोशिका द्रव्य की मात्रा कम होती है।
$\quad$परागकण में उपस्थित कायिक व जनन कोशिका इसकी दो-कोशिकीय अवस्था है। प्रायः आवृतबीजियों में परागकण दो-कोशिकीय अवस्था में ही परागकोश से मुक्त होते हैं। कुछ में तीन-कोशिकीय अवस्था में भी मुक्त होते हैं। परागकण स्वतन्त्र होने पर परागण क्रिया के अन्तर्गत जाते हैं। परागकणों के परागकोश से मुक्त होकर जायांग के वर्तिकाग्र तक पहुंचने की प्रक्रिया को परागण कहते हैं।
$\quad$परागकण वर्तिकाग्र पर अंकुरित होता है। अतः अन्तःचोल किसी एक जनन छिद्र से निकलकर जनन नलिका बनाती है। यही नलिका वृद्धि करके पराग नलिका बनाती है। पराग नलिका में आगे कायिक या नलिका कोशिका होती है तथा इसके पीछे जनन कोशिका होती है। कभी-कभी जनन कोशिका परागकण में ही विभाजित हो जाती है, यदि वहाँ विभाजन नहीं हुआ हो तो इसका विभाजन पराग नलिका में होता है। जनन कोशिका का समसूत्री विभाजन होने से दो नर युग्मक बनते हैं। यह अंकुरित परागकण जिसमें पराग नलिका व दो नर-युग्मक होते हैं, इस सम्पूर्ण संरचना को नर-युग्मको‌द्भिद् कहते हैं।
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Question 394 Marks
स्व - परागण तथा पर-परागण में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer
स्व - परागण तथा पर - परागण में अन्तर -
क्र.सं.स्व - परागणपर - परागण
1.इस प्रक्रिया में किसी एक पुष्प के परागकणों का स्थानान्तरण उसी पुष्प के या उसी पौधे में उपस्थित किसी अन्य पुष्प के वर्तिकाग्र पर होता है।एक पौधे के पुष्प के परागकण उसी जाति के किसी दूसरे पौधे के पुष्प के वर्तिकाग्र पर स्थानान्तरित होते हैं।
2.पुष्प प्रायः सुगन्धरहित, अनाकर्षक, छोटे तथा मकरन्दरहित होते हैं।पुष्प प्रायः (वायु परागित पुष्पों के अतिरिक्त) गन्धयुक्त, आकर्षक, बड़े या छोटे दो समूह में तथा मकरन्दयुक्त होते हैं।
3.इस प्रक्रिया में पुष्पों का द्विलिंगी या उभयलिंगी होना आवश्यक है।इसमें आवश्यक नहीं है।
4.इसमें परागकण व्यर्थ नहीं होते ।इस प्रक्रिया में परागकण बहुत अधिक व्यर्थ होते हैं।
5.इस क्रिया हेतु किन्हीं कर्मकों की आवश्यकता नहीं होती है।इसके लिये कर्मकों की आवश्यकता होती है तभी परागण सम्भव होता है।
6.इसमें नर तथा मादा जनन अंग साथ-साथ परिपक्व होते हैं।अलग-अलग समय पर परिपक्व होते हैं।
7.इस प्रकार के परागण से पौधों की शुद्धता बनी रहती है परन्तु विभिन्नता व विकास की सम्भावनाएँ कम होती हैं।शुद्धता न रहकर दोनों जनकों के लक्षणों का मिश्रण होता है, विभिन्नताएँ व विकास की सम्भावनाएँ अधिक होती हैं।
8.बार - बार स्वपरागण के फलस्वरूप बनने वाले पौधे दुर्बल व अस्वस्थ तथा बीज छोटे व हल्के होते हैं।पौधे स्वस्थ होते हैं तथा बीज भारी व बड़े होते हैं।
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